गुड बाय

गुड बाय

मीना अभी-अभी कमरे में आई थी। दो दिन की असीम थकान के बाद वह कुछ पल सुस्ताने आई थी। अंदर आते ही अपने पति की बड़ी सी तस्वीर के सामने खड़ी होकर वह उसे निहारती है और उसकी आंखों से आंसूओं की झड़ी लग जाती है। दो दिन से दिल में रोका हुआ गुब्बार आंसूओं के रूप में बहकर उसके मन को हल्का करने की कोशिश कर रहा है।रोते-रोते ही वह अपने पति से कह रही है ,
“देखा तुमने, आज तुम्हारी बेटी इस घर से विदा हो गई। आज इस घर से उसकी डोली उठ गई । कितनी प्यारी लग रही थी तुम्हारी बेटी शादी के इस जोड़े में! लाल जोड़े में सज धज कर जब वह तुम्हारे पास आशीर्वाद लेने आई थी तब तुम्हारा उसे गले लगाने का मन तो किया होगा ना ! पर तुम भी क्या कर सकते थे? मन मार कर रह गए होंगे। पर पर—- अपनी बिटिया को खूब सारा आशीर्वाद दिया होगा, उसके लिए भगवान से प्रार्थना की होगी कि उसका नव दांपत्य जीवन सुखी रहे।” वह कुछ देर अपने पति को ऐसे ही देखती रही।

” तुम चले गए , बीच मझधार में मुझे अकेला छोड़ कर चले गए। उस वक्त की छोटी -सी ,नन्ही -सी गुड़िया आज अपने पति के साथ इस घर से रुखसत हो गई। मैंने अपना कर्तव्य निभाया, कन्यादान कर दिया । इस घर से विदा होते वक्त वह खूब रोई थी।तुम्हारी याद भी उसे बहुत आई थी।मेरा भी दिल रो रहा था पर मैंने उसके सामने अपनी आंखों से एक आंसू का कतरा भी नहीं बहने दिया। मैं उसे कमजोर नहीं होने देना चाहती थी। उसे कभी एहसास नहीं होने दिया कि उसकी मां उसके बिना नहीं जी पाएगी। मैंने उसे खुशी खुशी विदा किया। देखा था ना तुमने, मैं कितनी मजबूर थी, चाह कर भी मैं उसे अपने पास नहीं रोक पाई। अब तुमसे एक विनती है , उसपर अपना आशीर्वाद बनाए रखना ,उसे अपने भावी जीवन में कभी कोई परेशानी का सामना न करना पड़े । उसे हिम्मत देना और जिसके तुम बहुत करीब हो उस भगवान से कहना तुम्हारी लाडो को हमेशा खुश रखे। उसके नए परिवार में वह हमेशा खुश रहे। “
मीना लगातार रो रही थी , रोते-रोते ही वह अपने पति से कह रही थी,
“मैं अब थक गई हूं, सारी जिम्मेदारियां निभाते निभाते अब मैं वाकई थक गई हूं ।” वह धड़ाम से बिस्तर पर गिर पड़ी। इतने दिनों की शादी की भाग दौड़ में उसने पलक भी नहीं झपकाईं थी । अब जैसे ही बेटी को विदा किया उसकी हिम्मत टूट गई और वह निढ़ाल होकर बिस्तर पर गिर गई। वह अपने पति के पास अपना दिल हल्का करना चाहती थी। अपने पति की याद में वह बहुत तड़पती थी । उसके बिना ही उसने पूरी शादी का कार्यक्रम पूरा किया था , धूमधाम से अपनी बेटी की शादी की थी। लेकिन दिल का एक कोना हमेशा खाली था जहां वह अपने पति को बसाए अपने कर्तव्य पूरे कर रही थी।

पति की हर पल सताती याद और अब बेटी का इस घर से विदा होना उसके दिल में एक गहरा खालीपन पैदा कर गया था। सबके सामने अपने दुख को छुपा कर मुस्कुराते -मुस्कुराते वह थक गई थी। अब उसे रोना था ,अपना मन हल्का करना था । बेटी को दुख ना हो इसलिए उसे भी उसने हंसते-हंसते विदा किया था । लेकिन अब वह अपना मन अपने पति के सामने हल्का कर रही थी ।

मीना की आंखों के सामने बारा साल पहले का चलचित्र चल रहा था । उस दिन भी वह अपने कमरे में आकर ऐसे ही रो रही थी जब उसके पति ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। वह अपने अतीत में चली गई। उसका भरा पूरा परिवार था, सास -ससुर, पति, दो प्यारे बच्चे और ढेर सारे रिश्तेदार । वह खुद डॉक्टर थी तो उसके पति भी डॉक्टर थे । उनका खुद का एक बड़ा सा अस्पताल था । एमबीबीएस पूरा करते ही उसकी शादी हो गई और जल्दी ही गर्भवती होने की वजह से उसका आगे पढ़ने का और पोस्ट ग्रेजुएशन करने का सपना अधूरा रह गया था । बच्चों की परवरिश और घर संभालने की जिम्मेदारी ने उसने सरकारी नौकरी करना ही ठीक समझा ताकि घर और ड्यूटी दोनों अच्छे से निभा सके । जिंदगी अच्छी कट रही थी। पति का अस्पताल काफी अच्छा चल रहा था ।उन्होंने अपने आप को काफी अच्छा पति और पिता साबित किया था ।सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक एक दिन उसके पति की तबीयत खराब हो गई और उसे अस्पताल में भर्ती करवा कर जब सारे टेस्ट किए गए तो पता चला कि उसे एक तरह की दिल की बीमारी है जो कभी ठीक नहीं हो सकती। और वक्त के साथ-साथ वह बढ़ती जाएगी, जो दवाइयां उपलब्ध है उससे सिर्फ वक्त बिताया जा सकता है लेकिन उसका पूरा इलाज नहीं हो सकता । डॉक्टर होने के नाते यह सत्य दोनों ही जानते थे और उन्होंने इस सत्य को स्वीकार भी कर लिया था। मीना अपने पति का पूरा ख्याल रखती थी, वक्त पर दवाइयां देना ,वक्त पर खाना पीना करना और क्या नहीं खाना, क्या खाना इस पर वह पूरा ध्यान देती। उसके पति स्वस्थ तो दिखते थे पर उन्हें भी पता था कि उनके पास कुछ सालों का ही वक्त है । बच्चे अभी छोटे थे तो उन्होंने उनके भविष्य के लिए काफी हद तक इंतजाम कर दिया था। जिस इंसान को अपने जाने का समय पता हो वह पहले से ही सचेत हो जाता है और अपने परिवार को उसके बाद तकलीफ ना हो इसकी तरफ उसका पूरा ध्यान रहता है और वह उस लक्ष्य को केंद्रित करते हुए आगे बढ़ता है । उसने अस्पताल चलाने के साथ-साथ प्रॉपर्टी भी खरीद कर रखी थी ताकि मीना को उसके जाने के बाद तकलीफ ना उठानी पड़े। अपने अस्पताल में भी नए डॉक्टर रख लिए थे ताकि उसके जाने के बाद वह अस्पताल भी सुचारू चलता रहे और उनके भविष्य में कोई कठिनाई पैदा ना हो। जब तक बच्चे बड़े नहीं हो जाते तब तक तो मीना को ही यह सारी चीज़ें संभालनी थी।

आदमी को जब अपनी मौत सामने दिखाई देती है तो उसे अपनी कम बल्कि अपने परिवार की चिंता ज्यादा सताती है। उसके जाने के बाद वह कैसे जिएंगे, उन्हें कोई तकलीफ तो नहीं होगी ,उसी के बारे में वह सोचता रहता है ।यह एक मानव प्रवृत्ति है जिसे कोई नहीं बदल सकता। यह अपने परिवार के प्रति उसका प्यार और कर्तव्य ही दर्शाता है । अब उसकी जिम्मेदारियां उसके लिए ज्यादा मायने रखती थी।
मीना के पति भी अपना पूरा ध्यान रखते थे । वक्त पर दवाइयां लेना, रेग्युलर चेकअप करवाना और जो भी नई तकनीक इस बीमारी में आती थी वह उसे अपनाते। पर इस दिल की बीमारी का अभी तक बहुत ज्यादा इलाज नहीं आया था और उनके पास ज्यादा से ज्यादा कुछ वर्ष और थे । किस्मत में जो लिखा होगा वह हो ही जाएगा तो फिर जो जिंदगी बची है उसे हंसते-हंसते बितानी है ,यही उन्होंने स्वीकार किया। और यह सही भी था । रोज यह सोचकर कि मैं मरने वाला हूं और पल-पल मरने से अच्छा है कि दिल खोलकर जो पल बचें हैं उन्हें हंसकर जीने में ही अक्लमंदी थी। और यही जिंदगी का दस्तूर है।
” जिंदगी की राह में मुश्किलें जरूर होगी लेकिन जो दिल
खोलकर जीते हैं वे मुश्किलों से पार पा जाते हैं।”

यही मीना और उसके पति की सोच थी। अपने सारे बिजनेस की जानकारी, अपने प्रॉपर्टी की जानकारी ,अपने पैसों की जानकारी ,अस्पताल की पूरी जानकारी उन्होंने मीना को पहले से ही दे दी थी ताकि उनके जाने के बाद मीना को कोई परेशानी ना हो। घर की समृद्धि पैसों से नहीं , इंसानों से है यह तो दोनों ही जानते थे पर मजबूर थे। वक्त हाथ से फिसलता जा रहा था । बच्चे अभी छोटे थे, उन्होंने अभी कॉलेज में भी कदम नहीं रखा था लेकिन यमराज इस बात को नहीं समझते थे और एक दिन उन्होंने उनके प्राण छिन ही लिए। मीना का सुहाग उजड़ गया था, उसके पति ने उसे हमेशा के लिए “गुड बाय” कह दिया था । वह उस दिन बहुत रोयी थी । सब कुछ जानते हुए भी वह अपने आप को संभाल नहीं पाई थी। उस वक्त उसका साथ उसके मासूम बच्चों ने दिया था । उन्होंने अपनी मां को समझाया , “मां, आप चिंता ना करें , हम है ना आपके पास। पापा भले ही अपने साथ ना हो पर आप के यह दोनों बच्चे आपका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे । “

बच्चे वक्त से पहले ही बड़े हो गए थे । खेलने कूदने की उम्र में उन्होंने मां के साथ परिवार की जिम्मेदारी उठा ली थी। धीरे-धीरे वक्त बितता गया । मीना ने अस्पताल की जिम्मेदारी संभाल ली, उसने अपनी नौकरी भी जारी रखी और सास ससुर और बच्चों की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही थी।
दो साल बाद बेटी का मेडिकल में एडमिशन हो गया, वह हॉस्टल चली गई और उसके जाने के दो साल बाद उसके बेटे का भी मेडिकल में एडमिशन हो गया और वह भी हॉस्टल में रहने चला गया और फिर से सारी जिम्मेदारी मीना पर आ गई थी। बच्चों को तो डॉक्टर ही बनना था । पापा का अस्पताल जो चलाना था , उसे और ऊंचाइयों पर ले जाना था । धीरे-धीरे बच्चे आगे बढ़ते गए और दोनों बच्चों ने पोस्ट ग्रेजुएशन भी कर लिया और अपने अस्पताल की जिम्मेदारी भी संभाल ली ।

अब मीना को अपनी बेटी की शादी की चिंता सताने लगी। उसने अपनी बेटी के लिए अच्छे वर की तलाश शुरू कर दी। कई रिश्ते आए उस होनहार बच्ची के लिए पर कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ कमी लड़के में देखकर वह पीछे हट जाती। पर उसने हार नहीं मानी और एक दिन उसे वह दामाद मिल ही गया जिसका उसे इंतजार था , बहुत ही सुंदर, सुशील डॉक्टर लड़का उसे अपनी लाड़ो के लिए मिल ही गया। बड़े ही धूमधाम से उसने अपनी बेटी की शादी की ताकि कोई यह ना कहे कि बिन बाप की बेटी के ब्याह में कमी रह गई। उसके बेटे ने और उसने अपनी तरफ से शानदार प्रोग्राम किए। सभी नाते रिश्तेदार आए और दोस्तों की मौजूदगी ने इस शादी में चार चांद लगा दिए । मीना ने सबका दिल से स्वागत किया और पूरे वक्त वह खुश नजर आ रही थी। बेटी की शादी की रस्में जब चल रही थी तब कई जगह पर उसकी आंखें नम हो जाती थी पर उस वक्त उसकी बेटी और बेटे का साथ पाकर वह फिर मुस्कुराने लग जाती । इस तरह आज बेटी इस घर से विदा हो गई ।उसकी एक और जिम्मेदारी पूरी हो गई ।दामाद के रूप में उसे एक और बेटा मिल गया । कई बार रिश्तेदारों ने उसका साथ छोड़ दिया था पर उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। जब उसके ससुर जी इस दुनिया से विदा हुए तब वह फिर एक बार डगमगा गई थी पर उसने जल्दी अपने आप को संभाल लिया था।

जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं पर जो हिम्मत से आगे बढ़ जाता है वही जिंदगी की यह जंग जीत जाता है, मीना को यह पाठ उसके पति ने अच्छी तरह से पढ़ाया था और मीना उसी के बताए रास्ते पर चल रही थी। आज बेटी को रुखसत करके वह अपने पति को यही बता रही थी ,” तुम्हारे बताए रास्ते पर मैं चल रही हूं पर हर पल तुम मुझे याद आते हो । मेरी मुस्कुराहट के पीछे जो दर्द छुपा हुआ है वह सिर्फ तुम ही समझ सकते हो। पर मैं यहीं पर रुक नहीं सकती । मेरी एक जिम्मेदारी अभी भी बाकी है , हमारे बेटे की गृहस्थी बसाना । बेटे की यह जिम्मेदारी पूरी करके मैं भी तुम्हारे पास आकर तुम्हारे साथ सुकून से जीना चाहती हुं, तब तक के लिए “गुड बाय।” जिंदगी का यह शो चलता रहना चाहिए — दी शो मस्ट गो ओन।” और उसने अपने पति को “गुड बाय” कह दिया ।
“गुड बाय, माय डियर! गुड बाय! “

डॉ मंजू राठी

एमबीबीएस एमडी

एलएलबी एलएलएम

❤️ मुझे तो जीना है।।❤️

❤️ मुझे तो जीना है।।❤️

आजकल छात्रों-बच्चों में आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं, जिनके आंकड़े डराने वाले हैं। माता-पिता द्वारा बच्चों पर पढ़ाई का दबाव , बच्चों की स्वयं की आशाएं, प्रेम प्रसंग, अकेलापन, व्यसन, पारिवारिक समस्याएं और पढ़ाई को लेकर दबाव, यह सभी चीजे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती हैं। कई बार बच्चे मेंटली इस तरह निराश और परेशान हो जाते हैं कि उनके दिमाग में आत्मघाती विचार आते हैं और ऐसे में उन्हें आत्महत्या ही इकलौता विकल्प दिखाई देता है।
इस कविता के मार्फत कवियत्री यह कहना चाहती है कि जिंदगी में परेशानियां हमेशा आती है ,लेकिन थोड़ा सा रुक के, संभल के, समझ के और इन परेशानियों को किसी के साथ साझा करने से इसका हल भी बहुत आसानी से निकल जाता है और जिंदगी जीने की प्रेरणा मिलती है। जीवन का अंत किसी भी परेशानी का समाधान नहीं है।
यह बहुत ही मार्मिक और सभी बच्चों को मोटिवेशन देने वाली कविता है।

❤️ मुझे तो जीना है।।❤️

क्यों करूं मैं अपने जीवन की हत्या।
क्यों करूं मैं आत्महत्या ।।
माना की तनाव है मुझ पर,
पढ़ाई का बोझ है
खाना पीना सोना हराम है
मां बाप का सपना है
जिंदगी में कुछ बनना है।
गर नहीं कर पाया यह सब कुछ
तो कैसे नजरे मिलाऊंगा मैं
मन में हजारों सवाल है
दिमाग में कशमकश है
क्यों जी रहा हूं मैं
मुझे तो मर जाना है।
फिर दिल कहता है, जरा रुक,
ऐसा भी क्या मरना है
थोड़ी कोशिश तो कर ले
न हारना है ,न जितना है
न भागना है इस अंधी दौड़ में
मुझे तो सिर्फ चलना है,
तो,क्यों करूं मैं अपने जीवन की हत्या।
क्यों करूं मैं आत्महत्या ।।
मुझे तो जीना है।मुझे तो जीना है।।

माना की मैं कमजोर हूं
नहीं कर पा रहा हूं
उन होशियारों का मुकाबला
नहीं समझ पा रहा हूं
गुरुजनों का पढा़या पाठ
नहीं दे पा रहा हूं
अपने सपनों को उडा़न
नहीं बचा पा रहा हूं
अपने जीवन दाता का मान
क्या फिर भी मुझे हक है जीने का ?
मेरे अपने कहते हैं,
छोड़ो इन बातों को और
सीखो जिंदगी जीने का मंत्र
डॉक्टर इंजीनियर के अलावा भी
बहुत कुछ है करने को
अगर तुम नहीं कर पा रहे हो,
तब भी तुम मेरे लाडले हो ।
ना रूकती है जिंदगी यहां पर,
वह तो सिर्फ बढ़ती रहती है
अगर चले जाओगे तुम ऐसे ही
तो दुख ना होगा तुमको,
लेकिन जीते जी मर जाएंगे
जो करते हैं तुझसे बेहद प्यार ।
मैं समझ गया
नहीं करूंगा अंत ऐसे इस जिंदगी का
मुझे तो लड़ना है ,मुझे तो जितना है,
मुझे तो आपके साथ जीना है
आपके साथ रहना है
तो क्यों करूं मैं अपने जीवन की हत्या।
क्यों करूं मैं आत्महत्या ।।
मुझे तो जीना है। मुझे तो जीना है।।

माना कि ,मुझे प्यार हुआ है
पर वह है बड़े घर की लाली
और मैं हूं साधारण – सा लाल
जिसका जेब खर्च है औना -पौना
लेकिन प्यार है दोगुना
वह जा रही है मुझसे दूर
मैंने की मिन्नतें कई बार
फिर भी वह नहीं चाहती रुकना,
शायद उसपर भी है दबाव उसके घर का
फिर भी मैं संभल जाऊंगा,
ना रोऊंगा, ना पछताऊंगा
जब वह न रुकी मेरे लिए ,
तो मैं क्यों रुकू उसके लिए
भीड़ जाऊंगा , लड़ जाऊंगा मैं इस जीवन से,
उडना है आसमान में ,
लेकर अपने सपनों को
जीना है मुझे अपनी शर्तों पर,
फिर से बसानी है दुनिया मेरी,
तो क्यों करूं मैं अपने जीवन की हत्या।
क्यों करूं मैं आत्महत्या ।।
मुझे तो जीना है। मुझे तो जीना है।।

माना की ,हो जाता हूं मैं कभी हताश
मन में आता है एक ही विचार
क्यों जीना है?
सारी उलझनों का एक ही उपाय
मर जाना है,
अलविदा सभी से कहना है।
अगर जाना ही ऐसे, तो जरा- सा रुकना
जरा – सा ठहरना, सोचना ,बोलना , चिल्लाना
और कहना ,
अपने मां बाप भाई बहन यार दोस्त से,
मुझे ना जीना है
देखो , फिर वो क्या कहते हैं,
पहले हसेंगे, फिर डाटेंगे ,
कुछ कहेंगे और फिर समझाएंगे
सुनना उनको ध्यान से और समझना भी,
तब तक शायद वो विचार भी हवा हो जाए
और समझ आ जाए,
अंत नहीं है इसका समाधान
मुझे तो लड़ना है
मुझे तो जीना है। मुझे तो जीना है।।

माना की, मैं गलत था
वह एक इंपल्स था।
तनाव तो सभी को है,
बच्चों से लेकर बुड्ढों तक
तो मैं अपवाद कैसे?
जानता हूं इसी का नाम जिंदगी है
तो क्यों भाग रहा था मैं,
आज नहीं तो कल रुक जाना है ,
तो क्यों न जिऊं अभी मस्ती में
दे दिया विराम मैंने
उन कमजोर विचारों को।
जीना है मुझे उनके लिए
जिन्होंने मुझे जनम दिया,
जिन्होंने मुझे पढ़ाया
जो मेरे साथ खेले,
जो मेरे लिए जिए।
उन्हें मैं यूं ना रुलाऊंगा,
हठ मेरा वही करेंगे पूरा
मुझे यूं ही न जाना है
बस, मुझे तो जीना है । मुझे तो जीना है।।

डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी/ एलएलबी एलएलएम
समाजसेविका

Goodbye MARSHAL

Goodbye MARSHAL

Marshall was a favorite of all of us. He was separated from his parents and came to my courtyard at the age of just one month. His birthday was 19th December. He came to our place on 24th January. We always celebrate this day as his birthday. For 9 years he lived with us in this house like a King. He was my lion and he looked the same too. Tall and broad, with a tilak on his forehead since birth, he was exactly like a lion. If someone sees him once, he will step back in fear. No stranger would dare to come in front of him.

31st October 2023 – 6:08pm
Today Marshall left us all and set out on his last journey. Never imagined that all this would happen so suddenly. No one had thought that this Marshal, who always used to run behind us while playing, would suddenly get separated from us like this.

My son went to study in a hostel and in the same year Marshall arrived in the house. Then after two-three years, my daughter also went to the hostel to study and then I, my husband and Marshal remained here. Now he considered himself the son of this house and started serving us.

Marshall was so bubbly, intelligent and innocent that anyone could fall in love with him, but even the best of people would drool at the sight of him. Once he starts barking, no stranger has the courage to come in front of him. Couldn’t even a bird dare to pop in his territory.

He understood everything we said. Can a dog also be so intelligent? I was surprised to see this. He had never caused trouble to anyone. Even when he was ill, he himself tried not to cause any trouble to anyone. He never littered the house. Used to complete all his work on time. Perhaps no human being could be as punctual as he was. How did he know the time, it was 5:00, it was 7:00, it was 6:00, no matter how much you missed the clock, he was so punctual.

He used to recognize the sound of our car all over the world. Leave alone the car’s horn, he used to come and stand in the verandah just by the sound of the car moving, he realized that our car had come.

If ever my voice came from downstairs, he would come and stand in the ramp, whether it took half an hour or an hour, he would stand there and wait, but would never come out after crossing the threshold. He was so intelligent.
Sometimes I alone would come early or my husband doctor would come early, then he would wait for the others. He considered both of us as his everything and never got tired of waiting. Despite repeated calls, he did not come inside the house until we all came home.

It was necessary to play with him every day, it was necessary to go out with him, it was necessary to talk with him and it was necessary to sit with him and watch TV. He could not rest until he played or had fun with us. He made us laugh, play with us, had fun and sometimes even made us angry. But he was my bubbly Marshal.

Sometimes he would get bored alone, sometimes he would run here and there to have fun, and suddenly he would break a pot or take out soil from a pot, then he would quietly sit on the ground with his ears down, so that he would not get scolded by us. Even if he was scolded, he would just respond with a gesture of ear and seeing this would make us laugh and we would forget to scold him. Such was this current Marshal.

Seeing such actions of his would make me laugh and the anger would disappear. He realized his mistake and I did not even feel like scolding him.

In his childhood, when Marshall used to go to the club in his car like a King to play, all the dogs on the road started recognizing him and sometimes even when an empty car passed by, the dogs on the road started calling him, thinking that Marshall was in it.
When they called him in their own language, I felt he was understanding their feelings.When he used to travel in his Centro car like a King, barking at his friends, he looked no less than a Maharaja. My daughter changed the name of “Centro” car to “Micentro” and that car belonged only to Marshall.

Perhaps even he didn’t know how he spent his day running in and out, up and down and making birds fly.
When my son and daughter used to come from the hostel, there was no limit to his happiness. Playing with them, and roaming around them with his tail wagging day and night.We both used to say that this is just a matter of chance and time being we have forgotten by him.

As soon as someone from us went out or took off his suitcase for packing, this Maharaj would sit in a corner sadly and watch their movements with twinkling eyes as if someone was going to leave him .And of course,whenever someone would return, He used to express his happiness loudly in his own language. There was no limit to the excitement he felt at that time. His happiness was that his family member has returned.

Whenever we went out and when we came back, and when we opened the lock, this gentleman should be the first to enter the house, this was his principle, no one could break it.

After coming in the evening, just like a child would wait for his grandparents to open the box for chocolates, he used to wait for the biscuits and would stand on two feet until he got the biscuits. How innocent this marshal was .

If there is a delay in getting up in the morning, then he tries to wake up by growling in a low voice while circling the bed and saying in his own language, “Now get up, it is morning, I want to go for a walk.” And he is ready to go on a walk with us. And when we start walking, he completes his walk following us. Such was this wise marshal.

Marshal was my daughter’s favourite and lovely friend .Even from the hostel, she did not feel at ease until she got to know his well-being every day or watched a video. Apart from his Marshall name, we all had given him many names which he understood very well like “Mishi, Mishiya, Marshu, Tutu”. He considered such names as his own and he responded to these names as much as he responded to Marshall.

For the last 9 years, he has been an important member of this house. He has been with us more than my son and daughter. He was with us Day and night, 24*7, I never thought that this life-giving soul would suddenly go away forever. Neither was thought of such .

Four days ago my father fell ill so I had to go to Maharashtra. That day, before leaving for the flight, he had a good meal from my hand. He even said bye to me. Had shaken hands.
Whenever we go out, he eats comfortably with our staff who take care of him. This time even my husband was at home so he used to eat food comfortably with him also. But I don’t know what happened this time that he stopped eating after I left. He was looking a little sick and was coughing. So my husband consulted a doctor and started giving medicines. But even on the second day, he did not eat anything, was only drinking water, was not even looking at food, then three-four doctors were called to see him and treated as per their advices .He was taken in a car and taken to the hospital, he was put on injections and drip too. Apart from that, many doctors were consulted, some tests were also done and it was found that he had some kidney problem, accordingly drip, injections and treatment started. My entire staff was engaged in his care. Everyone felt that he would get well soon and would again play, jump and run with everyone like before. But he had become silent.

Seeing that Marshal, who always used to jump up and down, had become silent, we also started getting scared. Half of my mind was towards Marshall and half on the other side. I couldn’t understand what to do. My daughter was scared after hearing about his condition, so I called her home in the middle of her studies so that she could feel comfortable after seeing him and even Marshal may feel comfortable by seeing her. But this could not happen. She tried a lot, served him completely, gave him all her time. But alas! His time had come so how could he be alright? Everyone was feeling pity seeing his small twinkling eyes. Everyone felt that those eyes of his were searching for me.

I was feeling very sad to know his condition. My father’s health started improving a little. I thought it appropriate to come to see him ,so that after seeing me he could eat something and his health would get better, thinking this I caught the first flight and came back.

As soon as I reached there, hearing my voice, he tried to get up. He came staggering towards me. I touched his forehead, caressed him lovingly, I could feel his eyes becoming moist. I kept caressing him lovingly and perhaps he felt relieved and he closed his eyes, lowered his neck and fell asleep peacefully.

One day was spent in his service. I placed all his favorite things in front of him but he did not even look at them. His four days’ fast had been completed, as he was performing Santhara.

Today was the fifth day. Today at 5:00 pm he broke his fast. He drank milk twice and that too from my husband’s hand. He seemed fine. Was sitting comfortably. There was peace in his eyes. When I started going to the hospital, he came inside silently as soon as the gate opened, just like always, with his head down and sat at his favorite place in his favorite room. I followed him back inside. I was surprised as to where he got so much strength that he walked back to his room as comfortably as before without faltering. After sitting, he looked at me, perhaps he seemed like he wanted to say something, I also kept looking at him lovingly and was telling my daughter to take care of him, during this he had hiccough twice and put his neck down. And before my daughter and myself could understand anything, he was no more.

I and my daughter were calling him “Marshal-Marshal” and shaking him, but he had now said goodbye to this world. Marshal had left on his last journey after saying goodbye to all of us. By moistening everyone’s eyes, by giving love to everyone, by creating a loving atmosphere in the house, he was going towards liberation from his current state.
Marshall left. Left everyone and went away. He left us on his last journey leaving us all in sorrow.

May the Supreme Father Almighty grant peace to his soul and grant him a place at His feet, this is my prayer at his feet.
Goodbye Marshall.
Bye bye marshal
Love you marshal
“Marshal, you will be greatly missed.”

Dr Manju Rathi

अलविदा मार्शल
31st October 2023 – 6:08pm
आज मार्शल हम सभी को छोड़कर अपने आखिरी सफर पर रवाना हो गया। कभी सोचा भी नहीं था कि यह सब इतना अचानक हो जाएगा। हमेशा खेलते -कुदते, हमारे पीछे-पीछे दौड़ने वाला यह मार्शल आज अचानक से हमारे से इस तरह जुदा हो जाएगा यह किसी ने भी नहीं सोचा था ।
मार्शल हम सभी का चहेता था ।सिर्फ एक महीने की उम्र में अपने माता-पिता से जुदा होकर मेरे आंगन में आया था। 19 दिसंबर उसका जन्म दिवस पर हमारे यहां वह 24 जनवरी को आया था। यह दिन हम हमेशा उसके जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। 9 साल से वह इस घर में एक राजा की तरह हमारे साथ रहा। वह मेरा शेर था और दिखता भी वैसे ही था। लंबा- चौड़ा,जन्म से माथे पर तिलक लगाए हुए, बिल्कुल एक शेर की तरह था। अगर कोई एक बार देख ले उसे तो डर के अपने पांव पीछे हटा ले। कोई भी अंजान उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करता था।
मेरा बेटा हॉस्टल में पढ़ने के लिए चला गया और उसी वर्ष मार्शल का घर में आगमन हो गया। फिर दो-तीन साल बाद बेटी भी हॉस्टल पढ़ने चली गई और फिर मैं, मेरे पति और मार्शल यही सब यहां रह गए। अब तो वह अपने आप को इस घर का बेटा मान कर हमारी सेवा करने लग गया था।
मार्शल इतना चुलबुला ,समझदार और मासूम था कि किसी को भी उस पर प्यार आ जाए ,पर उसे देखते ही अच्छे-अच्छे के पसीने भी छूट जाते थे। एक बार अगर उसने भौंकना शुरू कर दिया तो किसी अनजान की हिम्मत नहीं होती कि उसके सामने आए। उसकी टेरिटरी में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था ।
हमारी तो हर बात वह समझता था। कोई कुत्ता भी इतना समझदार हो सकता है ? यह देखकर मुझे आश्चर्य होता था। कभी भी उसने किसी को तकलीफ नहीं दी थी। बीमार होने पर भी वह स्वयं कोशिश करता था कि किसी को तकलीफ ना हो ।कभी भी घर में उसने गंदगी नहीं की थी। टाइम पर अपने सारे काम निपटाता था। वक्त का इतना पाबंद तो शायद इंसान भी नहीं हो सकता जितना वह था। वक्त का उसे कैसे पता चलता था कि अभी 5:00 बज गए अभी 7:00 बज गए अभी 6:00 बज गए हैं, बिल्कुल चाहे घड़ी मिला लो, ऐसा पंक्चुअल था।
हमारी कार की आवाज वह पूरी दुनिया में पहचान लेता था। कार का हॉर्न तो दूर सिर्फ कार चलने की आवाज से वह हमारी कार आ गई है और बरामदे में आकर खड़ा हो जाता था ।
अगर कभी नीचे से मेरी आवाज आ गई तो रैम्प में आकर खड़ा हो जाता था ,चाहे फिर आधा घंटा लगे ,चाहे एक घंटा लगे, वह वहीं पर खड़ा रह कर इंतजार करता था, लेकिन कभी दहलीज को पार करके बाहर नहीं आता था। इतना समझदार था वह ।
कभी मैं अकेली जल्दी आ जाती या फिर डॉक्टर साहब जल्दी आ जाते तो वह दूसरे का इंतजार करता था। वह हम दोनों को ही अपना सब कुछ मानता था और इंतजार करते-करते कभी थकता नहीं था। बार बार बुलाने पर भी वह घर के अंदर नहीं आता था जब तक कि हम सभी घर पर ना आ जाए।
रोज उसके साथ खेलना जरूरी था, उसके साथ घूमना जरूरी था,उसके साथ बातें करना जरूरी था और उसके साथ बैठकर टीवी देखना जरूरी था ।जब तक उसके साथ खेल ना लिए या मस्ती ना कर ली तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। वह हमें हंसाता भी था, खिलाता भी था, मस्ती भी कराता था और कभी-कभी गुस्सा भी दिलाता था । लेकिन था वह अपना चुलबुला मार्शल।
कभी अकेले में बोरियत हो जाती तो मस्ती करने के लिए कभी इधर-उधर दौड़ता था और अचानक कोई गमला तोड़ देता था या फिर कभी गमले से मिट्टी निकाल देता था तो चुपचाप कान नीचे करके जमीन पर पसरकर बैठ जाता था ताकि हमारी डांट ना पड़े और अगर डांट पड़ भी जाती तो सिर्फ कान के इशारे से उसका जवाब देता था और यह देखकर हमें हंसी आ जाती थी और हम उसे डांटना हीं भूल जाते थे। ऐसा था यह चालू मार्शल।
उसकी ऐसी हरकतें देखकर हंसी आ जाती थी और गुस्सा गायब हो जाता था। गलती का एहसास उसे हो जाता था और और फिर उसे डांटने का मन भी नहीं करता था ।
मार्शल बचपन में जब अपनी कार में राजा की तरह बैठकर क्लब जाता था खेलने के लिए तो रोड के सारे कुत्ते उसे पहचानने लग गए थे और कभी-कभी तो खाली कार वहां से गुजरती थी तब भी उसमें मार्शल है यह समझकर रोड के कुत्ते अपनी आवाज में,अपनी भाषा में उसे पुकारते थे तो उनकी समझदारी का एहसास होता था। जब यह एक राजा की तरह अपने दोस्तों पर भोंकते हुए अपनी सेंट्रो कार में सफर करता था तो एक महाराज से कम नहीं लगता था।मेरी बेटी ने तो उस
” सेंट्रो ” कार का नाम “मिसेंट्रो “कर दिया था और वह कार सिर्फ मार्शल की थी ।
दिन भर अंदर बाहर ,ऊपर नीचे दौड़ते हुए और परिंदे को उड़ाते हुए उसका दिन कैसे बीत जाता था शायद वह भी नहीं जानता था।
जब बेटा और बेटी हॉस्टल से आते थे तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था।उनके साथ खेलना, और 24 घंटे उनके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए घूमते देखकर तो हम दोनों यही कहते थे कि यह तो मौका परस्त है और हमें तो भूल ही गया है।
जैसे ही कोई बाहर जाता था या उसकी सूटकेस पैकिंग के लिए उतारता था तो यह महाराज उदास होकर एक कोने में बैठकर टिमटिमाती हुई आंखों से उनकी गतिविधि को देखते रहते थे कि अब उसे कोई छोड़कर जाने वाला है और जब कोई वापस लौट कर आता था तो अपनी भाषा में वह बड़े जोर-जोर से खुशी जाहिर करता था। उसवक्त उसमें जो उत्तेजना दिखती थी उसका कोई ठिकाना न था। उसकी खुशी यही थी कि उसका घर का सदस्य वापस आ गया है।
जब भी बाहर जाते थे और वापस आने पर ताला खोलने पर घर में सबसे पहले एंट्री इन्हीं महाशय की होनी चाहिए यह उसका उसूल था, उसे कोई भी तोड़ नहीं सकता था।
शाम को आने के बाद जैसे कोई बच्चा चॉकलेट के लिए दादा दादी का बक्सा खुलने का इंतजार करता था वैसे वह बिस्कुट के लिए इंतजार करता था और जब तक बिस्किट नहीं मिल जाते तब तक दो पांव पर खड़ा रहता था। ऐसा था यह मासूम मार्शल
सुबह अगर उठने में देरी हो जाती है तो यह बेड के चक्कर लगाते हुए धीमी आवाज में गुर्राते हुए उठाने की कोशिश करता है और अपनी भाषा में कह रहा होता है,”अब उठ भी जाओ ,सुबह हो गई है ,घूमने जाना है।” और स्वयं घूमने जाने के लिए तैयार रहता है। और जब हम घूमने शुरू करते हैं तो हमारे पीछे-पीछे वह अपनी वॉक भी पूरी कर लेता है। ऐसा था यह समझदार मार्शल।
मार्शल महाशय बेटी का तो लाडो था। हॉस्टल से भी जब तक उसका हाल-चाल रोज नहीं जान लेती या कोई वीडियो ना देख लेती तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। हम सभी ने उसके मार्शल नाम के अलावा भी अनेको नाम रखे थे जिन्हें वह बखूबी समझता था जैसे “मिशी,मिशिया,मार्शू, टुटू”। ऐसे नाम उसे अपने है यह वह समझता था और इन्हीं नाम को भी वह उतना ही रिस्पांस देता था जितना की मार्शल को।
पिछले 9 साल से वह इस घर का एक अहम सदस्य बन कर रहा ।मेरे बेटे और बेटी से ज्यादा हमारे साथ रहा ।दिन रात, 24*7 हमेशा-हमेशा जीव देने वाला यह जीव ऐसे अचानक हमेशा के लिए दूर हो जाएगा यह कभी सोचा न था।
चार दिन पहले मेरे पापा की तबीयत खराब हो गई थी तो मुझे महाराष्ट्र जाना पड़ गया। उस दिन फ्लाइट के लिए रवाना होने से पहले मेरे हाथ से उसने अच्छे से खाना खाया था। मुझे बाय-बाय भी किया था उसने। हाथ मिलाया था।
जब भी हम बाहर जाते हैं, वह हमारे स्टाफ से आराम से खाना खाता था और वही उसकी देखभाल करते थे। इस बार तो डॉक्टर साहब भी घर पर ही थे तो वह उनसे भी आराम से खाना खाता था ।लेकिन पता नहीं इस बार क्या हो गया, जो उसने मेरे जाने के बाद खाना ही छोड़ दिया ।थोड़ा बीमार सा लग रहा था, खांसी लग रही थी तो डॉक्टर को दिखाकर दवाइयां शुरू कर दी थी। लेकिन दूसरे दिन भी उसने कुछ नहीं खाया सिर्फ पानी पी रहा था, खाने की तरफ देख भी नहीं रहा था तो फिर तीन-चार डॉक्टर को बुलाकर दिखाया गया, गाड़ी में बिठाकर हॉस्पिटल भी ले जाया गया, उसको इंजेक्शन और ड्रिप पर रखा गया ।उसके अलावा कई डॉक्टर को कंसल्र्ट किया गया ,कुछ टेस्ट भी हुए और पता चला कि उसको कुछ किडनी प्रॉब्लम है ,उसी हिसाब से ड्रिप, इंजेक्शंस और ट्रीटमेंट शुरू हो गया। मेरा पूरा स्टाफ उसकी देखभाल में लगा हुआ था। सबको लग रहा था कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा और फिर से सबके साथ पहले के जैसे खेलेगा, कुदेगा, भागेगा। पर वह चुपचाप सा हो गया था। हमेशा ऊपर नीचे करने वाला मार्शल चुपचाप हो गया था यह देखकर हमें भी डर लगने लग गया था। मेरा आधा मन तो मार्शल की तरफ था और आधा उधर। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। मेरी बेटी की तो मार्शल जान था इसलिए मैंने उसकी पढ़ाई के बीच में ही उसे भी घर बुला लिया ताकि उसे देखकर वह ठीक हो जाए। पर ऐसा हो ना सका। उसने बहुत कोशिश की ,उसकी पूरी सेवा की, उसके साथ पूरा वक्त दिया ।लेकिन अफसोस! उसका वक्त आ गया था तो वह ठीक कैसे होता? उसकी छोटी सी टिमटिमाती आंखों को देखकर सबको दया आ रही थी। सभी को लगा कि उसकी वह आंखें मुझे ढूंढ रही है।
उसका हाल जानकर मुझे बड़ा दुख हो रहा था। मेरे पापा की तबीयत थोड़ी सी सुधरने लग गई थी। मैंने उसके पास आना उचित समझा ताकि मुझे देखकर वह कुछ खा ले और उसकी तबीयत ठीक हो जाए यही सोच कर मैंने पहली फ्लाइट पकड़ी और वापस आ गई।
मैं जैसे ही वहां पहुंची, मेरी आवाज सुनकर उसने उठने की कोशिश की। वह लड़खड़ाता हुआ मेरे पास आया। मैंने उसके माथे पर हाथ फेरा, उसे प्यार से सहलाया, मुझे लग रहा था, उसकी आंखें नम हो गई है। मैं उसे प्यार से सहलाती गई और शायद उसे सुकून मिल गया था और उसने अपनी आंखें बंद कर ली, गर्दन नीचे करके निश्चिंत सो गया।
एक दिन उसकी सेवा में गुजर गया। मैंने उसकी हर पसंदीदा चीज उसके सामने रखी पर उसने उसकी तरफ देखा भी नहीं। उसके चार दिन के व्रत पूरे हो चुके थे, जैसे वह संथारा कर रहा था ।
आज पांचवा दिन था आज शाम 5:00 बजे उसने अपना व्रत तोड़ दिया ।उसने दो बार दूध पिया वह भी डॉक्टर साहब के हाथ से । वह ठीक लग रहा था। आराम से बैठा हुआ था। उसकी आंखों में शांति थी। जब मैं हॉस्पिटल जाने लगी तो वह गेट खुलते ही चुपचाप अंदर आ गया, बिल्कुल हमेशा की तरह सर नीचे झुकाए और अपने फेवरेट कमरे में अपनी फेवरेट जगह पर जाकर बैठ गया। मैं वापस उसके पीछे-पीछे अंदर आ गई ।मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उसमें इतनी ताकत कहां से आ गई कि वह बिना लड़खड़ाए आराम से पहले जैसे चल के अपने कमरे में आ गया। उसने बैठने के बाद मेरी तरफ देखा, शायद ऐसे लगा कुछ कहना चाह रहा है, मैं भी प्यार से उसे निहारती गई और बेटी से कह रही थी कि इसका ध्यान रखना ,इतने में उसने दो बार हिचकी ली और अपनी गर्दन नीचे डाल दी ।मुझे और मेरी बेटी को कुछ समझ में आता उससे पहले ही उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे ।
मैं और मेरी बेटी “मार्शल -मार्शल ” कहे जा रहे थे और उसे झंझोड रहे थे,लेकिन वह अब इस दुनिया को अलविदा कह चुका था। मार्शल हम सभी को बाय-बाय करके अपने आखिरी सफर पर रवाना हो चुका था। सब की आंखों को नम करके, सबको प्यार देकर, घर में प्यार भरा माहौल बनाकर वह जा रहा था अपनी इस योनि से मुक्ति की ओर।
मार्शल चला गया। सभी को छोड़कर चला गया। हम सभी को गम में डूबोकर वह अपनी अंतिम यात्रा पर चल दिया।
परमपिता परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें और अपने श्री चरणों में उसे स्थान दे यही उनके चरणों में अर्जी है।
अलविदा मार्शल ।
बाय-बाय मार्शल
लव यू मार्शल
” मार्शल ,तुम बहुत याद आओगे।”

अलविदा मार्शल
31st October 2023 – 6:08pm
आज मार्शल हम सभी को छोड़कर अपने आखिरी सफर पर रवाना हो गया। कभी सोचा भी नहीं था कि यह सब इतना अचानक हो जाएगा। हमेशा खेलते -कुदते, हमारे पीछे-पीछे दौड़ने वाला यह मार्शल आज अचानक से हमारे से इस तरह जुदा हो जाएगा यह किसी ने भी नहीं सोचा था ।
मार्शल हम सभी का चहेता था ।सिर्फ एक महीने की उम्र में अपने माता-पिता से जुदा होकर मेरे आंगन में आया था। 19 दिसंबर उसका जन्म दिवस पर हमारे यहां वह 24 जनवरी को आया था।  यह दिन हम हमेशा उसके जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। 9 साल से वह इस घर में एक राजा की तरह  हमारे साथ रहा। वह मेरा शेर था और दिखता भी वैसे ही था। लंबा- चौड़ा,जन्म से माथे पर तिलक लगाए हुए, बिल्कुल एक शेर की तरह था। अगर कोई एक बार देख ले उसे तो डर के अपने पांव पीछे हटा ले। कोई भी अंजान उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करता था।
मेरा बेटा हॉस्टल में पढ़ने के लिए चला गया और उसी  वर्ष  मार्शल का  घर में आगमन हो गया।  फिर दो-तीन साल बाद बेटी भी हॉस्टल पढ़ने चली गई और फिर मैं, मेरे पति और मार्शल यही सब यहां रह गए। अब तो वह  अपने आप को इस घर का बेटा मान कर हमारी सेवा करने लग गया था।
मार्शल  इतना चुलबुला ,समझदार और मासूम था कि किसी को भी उस पर प्यार आ जाए ,पर उसे देखते ही अच्छे-अच्छे के पसीने भी छूट जाते थे। एक बार अगर उसने भौंकना शुरू कर दिया तो किसी अनजान की हिम्मत नहीं होती कि उसके सामने आए। उसकी  टेरिटरी में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था ।
हमारी तो हर बात वह समझता था। कोई कुत्ता भी इतना समझदार हो सकता है ? यह देखकर मुझे आश्चर्य होता था। कभी भी उसने किसी को तकलीफ नहीं दी थी। बीमार होने पर भी वह स्वयं कोशिश करता था कि किसी को तकलीफ ना हो ।कभी भी घर में उसने गंदगी नहीं की थी। टाइम पर अपने सारे काम निपटाता था। वक्त का इतना पाबंद तो शायद इंसान भी नहीं हो सकता जितना वह था। वक्त का उसे कैसे पता चलता था कि अभी 5:00 बज गए अभी 7:00 बज गए अभी 6:00 बज गए हैं, बिल्कुल चाहे घड़ी मिला लो, ऐसा  पंक्चुअल था।
हमारी कार की आवाज वह पूरी दुनिया में पहचान लेता था। कार का हॉर्न तो दूर सिर्फ कार चलने की आवाज से वह हमारी कार आ गई है और  बरामदे में आकर खड़ा हो जाता था ।
अगर कभी नीचे से मेरी आवाज आ गई तो रैम्प में आकर खड़ा हो जाता था ,चाहे फिर आधा घंटा लगे ,चाहे एक घंटा लगे, वह वहीं पर खड़ा रह कर इंतजार करता था, लेकिन कभी दहलीज को पार करके बाहर नहीं आता था। इतना समझदार था वह ।
कभी मैं अकेली जल्दी आ जाती या फिर डॉक्टर साहब जल्दी आ जाते तो वह दूसरे का इंतजार करता था। वह हम दोनों को ही अपना सब कुछ मानता था और इंतजार करते-करते कभी थकता नहीं था। बार बार बुलाने पर भी वह घर के अंदर  नहीं आता था जब तक कि हम सभी घर पर ना आ जाए।
रोज उसके साथ खेलना जरूरी था, उसके साथ घूमना जरूरी था,उसके साथ बातें करना जरूरी था और उसके साथ बैठकर टीवी देखना जरूरी था ।जब तक उसके साथ खेल ना लिए या मस्ती ना कर ली तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। वह हमें  हंसाता भी था, खिलाता भी था, मस्ती भी कराता था और कभी-कभी गुस्सा भी दिलाता था । लेकिन था वह अपना चुलबुला  मार्शल।
कभी अकेले में बोरियत हो जाती तो मस्ती करने के लिए कभी इधर-उधर दौड़ता था और अचानक कोई गमला तोड़ देता था या फिर कभी गमले से मिट्टी निकाल देता था तो चुपचाप कान नीचे करके जमीन पर पसरकर बैठ जाता था ताकि हमारी डांट ना पड़े और अगर डांट पड़ भी जाती तो सिर्फ कान के इशारे से उसका जवाब देता था और यह देखकर हमें हंसी आ जाती थी और हम उसे डांटना हीं भूल जाते थे। ऐसा था यह चालू मार्शल।
उसकी ऐसी हरकतें देखकर हंसी आ जाती थी और गुस्सा गायब हो जाता था। गलती का एहसास उसे हो जाता था और और फिर उसे डांटने का मन भी नहीं करता था ।
मार्शल बचपन में जब अपनी कार में राजा की तरह बैठकर क्लब जाता था खेलने के लिए तो रोड के सारे कुत्ते उसे पहचानने लग गए थे और कभी-कभी तो खाली कार वहां से गुजरती थी तब भी उसमें मार्शल है यह समझकर रोड के कुत्ते अपनी आवाज में,अपनी भाषा में उसे पुकारते थे तो उनकी समझदारी का एहसास होता था। जब  यह  एक राजा की तरह अपने दोस्तों पर भोंकते हुए अपनी सेंट्रो कार में सफर करता था तो एक महाराज से कम नहीं लगता था।मेरी बेटी ने तो उस
” सेंट्रो ” कार का नाम “मिसेंट्रो “कर दिया था और वह कार सिर्फ मार्शल की थी ।
दिन भर अंदर बाहर ,ऊपर नीचे दौड़ते हुए और परिंदे को उड़ाते हुए उसका दिन कैसे बीत जाता था शायद वह भी नहीं जानता था।
जब बेटा और बेटी हॉस्टल से आते थे तो  उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था।उनके साथ खेलना, और 24 घंटे उनके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए घूमते देखकर तो हम दोनों यही कहते थे कि यह तो मौका परस्त है और हमें तो भूल ही गया है।
जैसे ही कोई बाहर जाता था या उसकी सूटकेस पैकिंग के लिए उतारता था तो यह महाराज उदास होकर एक कोने में बैठकर टिमटिमाती हुई आंखों से उनकी गतिविधि को देखते रहते थे कि अब उसे कोई छोड़कर जाने वाला है और जब कोई वापस लौट कर आता था तो अपनी भाषा में वह बड़े जोर-जोर से खुशी जाहिर करता था। उसवक्त उसमें जो उत्तेजना दिखती थी उसका कोई ठिकाना न था। उसकी खुशी यही थी कि उसका घर का सदस्य वापस आ गया है।
जब भी बाहर जाते थे और वापस आने पर ताला खोलने पर घर में सबसे पहले एंट्री इन्हीं महाशय की होनी चाहिए यह उसका उसूल था, उसे कोई भी तोड़ नहीं सकता था।
शाम को आने के बाद जैसे कोई बच्चा चॉकलेट के लिए दादा दादी का बक्सा खुलने का इंतजार करता था  वैसे वह बिस्कुट के लिए इंतजार करता था और जब तक बिस्किट नहीं मिल जाते तब तक दो पांव पर खड़ा रहता था। ऐसा था यह मासूम मार्शल
सुबह अगर उठने में देरी हो जाती है तो यह  बेड के चक्कर लगाते हुए धीमी आवाज में गुर्राते हुए उठाने की कोशिश करता है और अपनी भाषा में कह रहा होता है,”अब उठ भी जाओ ,सुबह हो गई है ,घूमने जाना है।” और स्वयं घूमने जाने के लिए तैयार रहता है। और जब हम घूमने शुरू करते हैं तो हमारे पीछे-पीछे वह अपनी वॉक भी पूरी कर लेता है। ऐसा था यह समझदार मार्शल।
  मार्शल महाशय बेटी का तो  लाडो था। हॉस्टल से भी जब तक उसका हाल-चाल रोज नहीं जान लेती या कोई वीडियो ना देख लेती तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। हम सभी ने उसके मार्शल नाम के अलावा भी अनेको नाम रखे थे जिन्हें वह बखूबी समझता था जैसे “मिशी,मिशिया,मार्शू, टुटू”। ऐसे नाम उसे अपने है यह वह समझता था और इन्हीं नाम को भी वह उतना ही रिस्पांस देता था जितना की मार्शल को।
पिछले 9 साल से वह इस घर का एक अहम सदस्य बन कर रहा ।मेरे बेटे और बेटी से ज्यादा हमारे साथ रहा ।दिन रात, 24*7 हमेशा-हमेशा जीव देने वाला यह जीव ऐसे अचानक हमेशा के लिए दूर हो जाएगा यह कभी सोचा न था।
चार दिन पहले मेरे पापा की तबीयत खराब हो गई थी तो मुझे महाराष्ट्र जाना पड़ गया। उस दिन फ्लाइट के लिए रवाना होने से पहले मेरे हाथ से उसने अच्छे से खाना खाया था। मुझे बाय-बाय भी किया था उसने। हाथ मिलाया था।
जब भी हम बाहर जाते हैं, वह हमारे स्टाफ से आराम से खाना खाता था और वही उसकी देखभाल करते थे। इस बार तो डॉक्टर साहब भी घर पर ही थे तो वह उनसे भी आराम से खाना खाता था ।लेकिन पता नहीं इस बार क्या हो गया, जो उसने मेरे जाने के बाद खाना ही छोड़ दिया ।थोड़ा बीमार सा लग रहा था, खांसी लग रही थी तो डॉक्टर को दिखाकर दवाइयां शुरू कर दी थी। लेकिन दूसरे दिन भी उसने कुछ नहीं खाया सिर्फ पानी पी रहा था, खाने की तरफ देख भी नहीं रहा था तो फिर तीन-चार डॉक्टर को बुलाकर दिखाया गया, गाड़ी में बिठाकर हॉस्पिटल भी ले जाया गया, उसको इंजेक्शन और ड्रिप पर रखा गया ।उसके अलावा कई डॉक्टर को कंसल्र्ट किया गया ,कुछ टेस्ट भी हुए और पता चला कि उसको कुछ किडनी प्रॉब्लम है ,उसी हिसाब से ड्रिप, इंजेक्शंस और ट्रीटमेंट शुरू हो गया। मेरा पूरा स्टाफ उसकी देखभाल में लगा हुआ था। सबको लग रहा था कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा और फिर से सबके साथ पहले के जैसे खेलेगा, कुदेगा, भागेगा। पर  वह चुपचाप सा हो गया था। हमेशा ऊपर नीचे करने वाला मार्शल चुपचाप  हो गया था यह देखकर हमें भी डर लगने लग गया था। मेरा आधा मन तो मार्शल की तरफ था और आधा उधर। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। मेरी बेटी की तो मार्शल जान था इसलिए मैंने उसकी पढ़ाई के बीच में ही उसे भी घर बुला लिया ताकि उसे देखकर वह ठीक हो जाए। पर ऐसा हो ना सका। उसने बहुत कोशिश की ,उसकी पूरी सेवा की, उसके साथ पूरा वक्त दिया ।लेकिन अफसोस! उसका वक्त आ गया था तो वह ठीक कैसे होता? उसकी छोटी सी टिमटिमाती आंखों को देखकर सबको दया आ रही थी।  सभी को लगा कि उसकी वह आंखें मुझे ढूंढ रही है।
उसका हाल जानकर मुझे बड़ा दुख हो रहा था। मेरे पापा की तबीयत थोड़ी सी सुधरने लग गई थी। मैंने  उसके पास आना उचित समझा ताकि मुझे देखकर वह कुछ खा ले और उसकी तबीयत ठीक हो जाए यही सोच कर मैंने पहली फ्लाइट पकड़ी और वापस आ गई।
मैं जैसे ही वहां पहुंची, मेरी आवाज सुनकर उसने उठने की कोशिश की। वह लड़खड़ाता हुआ मेरे पास आया। मैंने उसके माथे पर हाथ फेरा, उसे प्यार से सहलाया, मुझे लग रहा था, उसकी आंखें नम हो गई है। मैं उसे प्यार से सहलाती गई और शायद उसे सुकून मिल गया था और उसने अपनी आंखें बंद कर ली, गर्दन नीचे करके निश्चिंत सो गया।
एक दिन उसकी सेवा में गुजर गया। मैंने उसकी हर पसंदीदा चीज उसके सामने रखी पर उसने उसकी तरफ देखा भी नहीं। उसके चार दिन के व्रत पूरे हो चुके थे, जैसे वह संथारा कर रहा था ।
आज पांचवा दिन था आज शाम 5:00 बजे उसने अपना व्रत तोड़ दिया ।उसने दो बार दूध पिया वह भी डॉक्टर साहब के हाथ से । वह ठीक लग रहा था। आराम से बैठा हुआ था। उसकी आंखों में शांति थी। जब मैं हॉस्पिटल जाने लगी तो वह गेट खुलते ही चुपचाप अंदर आ गया, बिल्कुल हमेशा की तरह सर नीचे झुकाए और अपने फेवरेट कमरे में अपनी फेवरेट जगह पर जाकर बैठ गया। मैं वापस उसके पीछे-पीछे अंदर आ गई ।मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उसमें इतनी ताकत कहां से आ गई कि वह बिना लड़खड़ाए  आराम से पहले जैसे चल के अपने कमरे में आ गया। उसने बैठने के बाद मेरी तरफ देखा, शायद ऐसे लगा कुछ कहना चाह रहा है, मैं  भी प्यार से उसे निहारती गई और बेटी से कह रही थी कि इसका ध्यान रखना ,इतने में  उसने दो बार हिचकी ली और अपनी गर्दन नीचे डाल दी ।मुझे और मेरी बेटी को कुछ समझ में आता उससे पहले ही उसके प्राण पखेरू  उड़ चुके थे ।
मैं और मेरी बेटी “मार्शल -मार्शल ” कहे जा रहे थे और उसे झंझोड रहे थे,लेकिन वह अब इस दुनिया को अलविदा कह चुका था। मार्शल हम सभी को बाय-बाय करके अपने आखिरी सफर पर रवाना हो चुका था। सब की आंखों को नम करके, सबको प्यार देकर, घर में प्यार भरा माहौल बनाकर वह जा रहा था अपनी इस योनि से मुक्ति की ओर।
मार्शल चला गया। सभी को छोड़कर चला गया। हम सभी को गम में डूबोकर वह अपनी अंतिम यात्रा पर चल दिया।
परमपिता परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें और अपने श्री चरणों में उसे स्थान दे यही उनके चरणों में अर्जी है।
अलविदा मार्शल ।
बाय-बाय मार्शल
लव यू मार्शल
” मार्शल ,तुम बहुत याद आओगे।”

लोकतंत्र में जनता का योगदान अभी अधूरा है।

लोकतंत्र में जनता का योगदान अभी अधूरा है।

आज चुनाव संपन्न हो गए। हमारा मत मतपेटियों में बंद हो गया ।प्रत्याशियों का भविष्य इन पेटियों में कैद हो चुका है। पिछले कई महीनों से ,कई दिनों से अनेक प्रत्याशियों ने अपनी ताकत झोंक दी अपने इस कैंपेन में । सभी ने अपना सर्वोच्च दिया ।जनता ने भी उनका भरपूर साथ दिया। सब ने अपने अपने पसंदीदा प्रत्याशियों का समर्थन किया ,किसी ने खुलकर साथ दिया ,तो किसी ने बिना सामने आए । उम्मीद है कि हर एक ने अपने मताधिकार का प्रयोग जरूर किया होगा। लोकतंत्र के इस महायज्ञ में वोट रुपी आहुति सभी ने अर्पित की होगी।
अब इंतजार है तो रिजल्ट का। अब जनता को फर्क नहीं पड़ता कोई भी प्रत्याशी जीते या किसी की भी सरकार बने। जनता तो बस इतना चाहती है कि यह कार्यकाल पूरा होने से पहले जनता से किए हुए वादे वह प्रत्याशी और सरकार दोनों ही पूरे करें ।जनता तो बस अपना विकास चाहती है। अपनी जिंदगी खुशहाल चाहती है। अब जनता को किसी पार्टी से कोई मतलब नहीं। वह खुमारी अब उतर चुकी है ।अब जो भी प्रत्याशी जीतेगा जनता उसको सहर्ष स्वीकार करेगी और जो प्रत्याशी हार गए हैं ,जनता उनका भी सम्मान करेगी। क्योंकि चुनाव में हार जीत तो लगी रहती है ।कोई विरुद्ध खड़ा होता है तभी तो हार जीत होती है। एक हारेगा तभी दूसरा जीतेगा, यह सतत प्रक्रिया है। इसलिए अब हार जीत में जनता नहीं जाना चाहती और इस झमेले में पडना भी नहीं चाहती। क्योंकि अब जनता को जागरूक रहना है। उन्हें अपनी समस्याओं का निराकरण करने वाला नेता मिल चुका है ।
जनता को हर पल चौकन्ना रहना है। जनता को हर समय याद रखना है कि उस प्रत्याशी ने क्या वादे किए थे और कितने वादे पूरे किए हैं और वह प्रत्याशी उन वादों पर कितना खरा उतर रहा है ।जनता को हर वक्त जागरूक रहना है और मुफ्त की रेवड़ियों से परे होकर अपने रोजगार, अपनी सेहत ,अपने रहन-सहन में सुधार करने के लिए सरकार को जागरुक करते रहना है। चुनाव खत्म हो गए हैं तो सरकार को सोने नहीं देना है । ऐसा करना मतलब अपना स्वयं का नुकसान करना है। और कोई खुली आंखों से स्वयं का नुकसान कैसे कर सकता है? इसलिए लोकतंत्र में जनता का योगदान अभी भी अधूरा है जब तक आपके अपने सपने पूरे ना हो जाए।
जनता ,आप सरकार और प्रत्याशियों को जगाते रहिए ।
वरना पता चले 5 साल निकल चुके और फिर चुनाव के वक्त सरकार और प्रत्याशी मैदान में ताल ठोकने के लिए तैयार हो गए हैं ।और यह चुनावी चौसर फिर सज गई है और हम जनता फिर जोर-शोर से उनके साथ जुड़ गए हैं ,फिर इसी उम्मीद के साथ की जनता का भला होगा।
सभी प्रत्याशियों को अग्रिम शुभकामनाएं। आप सभी से विनम्र अपील है कि जो भी जनता का फैसला रहे उसका सम्मान करें और जनहित में कार्य करें ताकि आने वाले समय में जनता आपके उन कार्यों को याद रखें और आपको पुनः प्रत्याशी के रूप में देखने की इच्छा जाहिर करें ।
जागो ,जनता जागो ।
जनता ,अपना हक सभी को याद दिलाते रहो ,फिर चाहे वह सरकार हो या फिर आपका अपना प्रत्याशी या आपका अपना नेता ।
जागो ,जनता जागो ।
पुनः एक बार सभी प्रत्याशियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
धन्यवाद।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस. एमडी।
एलएलबी एलएलएम
समाज सेविका ,ब्लॉगर, लेखिका।

दिल तो बच्चा है जी।

चाहे उम्र कोई भी हो
हमारे अंदर एक बच्चा है जी
चाहे जवान हो या बुढ़ा
दिल तो बच्चा है जी।

यह केवल वर्ष हैं जो बढ़ते हैं,
जिंदगी की भाग दौड़ में बाल सफेद होते हैं
चेहरे पर झुर्रियां भी आती है
लेकिन फिर भी मन तो बच्चा है जी
दिल तो सच्चा है जी।

बरस -दर- बरस मीठे कड़वे अनुभव जुड़ते हैं
भूल जाते हैं कि मन भी कभी कोमल था,
ऐसी ही इन कोमल भावनाओं का दम घोंटकर
बढ़ जाते हैं जिंदगी के इस सफर में
अपने ही बचपन को तिलांजलि देकर
गुम हो जाते हैं, लेकिन फिर भी
दिल तो बच्चा है,सच में सच्चा है जी।

मत भूलो उस बचपन को
जिसको हमने जिया है –
हंसते -गाते ,खेलते -कुदते।
अब मान भी जाओ,
उस बचपन पर अधिकार स्वयं का जमा लो,
अब लौट आने दो उस बचपन को
जिसको बरसों पहले छोड़ा है
याद रहे
दिल तो बच्चा है जी, सच में सच्चा है जी।

मत भूलो,
पीछे मुड़कर देखने के लिए हमेशा कुछ न कुछ होता है जी
सिर्फ उसे जीने की चाहत हो , और
लौट आओ उस पुराने बचपन में।
सच में दिल तो बच्चा है जी ,मन तो सच्चा है जी।

आज आज़ाद होने का दिन है
पिंजरे की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए,
अपने अंदर के बच्चे को मुक्त करो जी
इससे पहले कि गुमनाम बनो
लौट आओ उस बचपन में,
सच में दिल तो बच्चा है जी, मन तो सच्चा है जी।

डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएलएम
ब्लॉगर ,लेखिका और समाजसेविका

Medical Negligence and INDIAN NEW Law( BNS)

Medical Negligence and Law

What doctors gained by new law – BNS
Is it the right time to celebrate?
Is the Decriminalisation of the medical profession done?

In IPC sec 304 a is applicable for doctors which describes punishment in form of
1.Imprisonment for 2 years
2.Fine only
3.Imprisonment for 2 years and fine both.

But in Resent BNS
For medical negligence BNS sec 106(1) is applicable which describes punishment in form of—
1.Imprisonment for two years and fine .

IPC 304A
“Causing death by negligence.–Whoever causes the death of any person by doing any rash or negligent act not amounting to culpable homicide, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.”

BNS 2023
Causing death by negligence

  1. (1) Whoever causes death of any person by doing any rash or negligent act not
    amounting to culpable homicide, shall be punished with imprisonment of either description
    for a term which may extend to five years, and shall also be liable to fine.

AMENDMENT in sec 106 of BNS
“and if such act is done by a registered medical practitioner while performing medical procedure, he shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, and shall also be liable to fine” — to clause 106(1) that deals with “causing death by negligence”.

Explanation.-For the purposes of this sub-section, “registered medical practitioner”
means a medical practitioner who possesses any medical qualification recognised under the
National Medical Commission Act, 2019 and whose name has been entered in the National
Medical Register or a State Medical Register under that Act.
So think about this.
Are doctors really saved?
Now what supersede?
Amended Law or Supreme Court verdicts?
Does SC give attention to precedents in future ?
Think, deeply Think and React.

Dr Manju Rathi
MBBS MD LLB LLM

लोकतंत्र में जनता का अधूरा योगदान कैसे पूरा होगा

लोकतंत्र में जनता का योगदान अभी अधूरा है।

आज चुनाव संपन्न हो गए। हमारा मत मतपेटियों में बंद हो गया ।प्रत्याशियों का भविष्य इन पेटियों में कैद हो चुका है। पिछले कई महीनों से ,कई दिनों से अनेक प्रत्याशियों ने अपनी ताकत झोंक दी अपने इस कैंपेन में । सभी ने अपना सर्वोच्च दिया ।जनता ने भी उनका भरपूर साथ दिया। सब ने अपने अपने पसंदीदा प्रत्याशियों का समर्थन किया ,किसी ने खुलकर साथ दिया ,तो किसी ने बिना सामने आए । उम्मीद है कि हर एक ने अपने मताधिकार का प्रयोग जरूर किया होगा। लोकतंत्र के इस महायज्ञ में वोटरुपी आहुति सभी ने अर्पित की होगी।
अब इंतजार है तो रिजल्ट का। अब जनता को फर्क नहीं पड़ता कोई भी प्रत्याशी जीते या किसी की भी सरकार बने। जनता तो बस इतना चाहती है कि यह कार्यकाल पूरा होने से पहले जनता से किए हुए वादे वह प्रत्याशी और सरकार दोनों ही पूरे करें ।जनता तो बस अपना विकास चाहती है। अपनी जिंदगी खुशहाल चाहती है। अब जनता को किसी पार्टी से कोई मतलब नहीं। वह खुमारी अब उतर चुकी है ।अब जो भी प्रत्याशी जीतेगा जनता उसको सहर्ष स्वीकार करेगी और जो प्रत्याशी हार गए हैं ,जनता उनका भी सम्मान करेगी। क्योंकि चुनाव में हार जीत तो लगी रहती है ।कोई विरुद्ध खड़ा होता है तभी तो हार जीत होती है। एक हारेगा तभी दूसरा जीतेगा, यह सतत प्रक्रिया है। इसलिए अब हार जीत में जनता नहीं जाना चाहती और इस झमेले में पडना भी नहीं चाहती। क्योंकि अब जनता को जागरूक रहना है। उन्हें अपनी समस्याओं का निराकरण करने वाला नेता मिल चुका है ।
जनता को हर पल चौकन्ना रहना है। जनता को हर समय याद रखना है कि उस प्रत्याशी ने क्या वादे किए थे और कितने वादे पूरे किए हैं और वह प्रत्याशी उन वादों पर कितना खरा उतर रहा है ।जनता को हर वक्त जागरूक रहना है और मुफ्त की रेवड़ियों से परे होकर अपने रोजगार, अपनी सेहत ,अपने रहन-सहन में सुधार करने के लिए सरकार को जागरुक करते रहना है। चुनाव खत्म हो गए हैं तो सरकार को सोने नहीं देना है । ऐसा करना मतलब अपना स्वयं का नुकसान करना है। और कोई खुली आंखों से स्वयं का नुकसान कैसे कर सकता है? इसलिए लोकतंत्र में जनता का योगदान अभी भी अधूरा है जब तक आपके अपने सपने पूरे ना हो जाए।
जनता ,आप सरकार और प्रत्याशियों को जगाते रहिए ।
वरना पता चले 5 साल निकल चुके और फिर चुनाव के वक्त सरकार और प्रत्याशी मैदान में ताल ठोकने के लिए तैयार हो गए हैं ।और यह चुनावी चौसर फिर सज गई है और हम जनता फिर जोर-शोर से उनके साथ जुड़ गए हैं ,फिर इसी उम्मीद के साथ की जनता का भला होगा।
सभी प्रत्याशियों को अग्रिम शुभकामनाएं। आप सभी से विनम्र अपील है कि जो भी जनता का फैसला रहे उसका सम्मान करें और जनहित में कार्य करें ताकि आने वाले समय में जनता आपके उन कार्यों को याद रखें और आपको पुनः प्रत्याशी के रूप में देखने की इच्छा जाहिर करें ।
जागो ,जनता जागो ।
जनता ,अपना हक सभी को याद दिलाते रहो ,फिर चाहे वह सरकार हो या फिर आपका अपना प्रत्याशी या आपका अपना नेता ।
जागो ,जनता जागो ।
पुनः एक बार सभी प्रत्याशियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
धन्यवाद।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस. एमडी।
एलएलबी एलएलएम
समाज सेविका ,ब्लॉगर, लेखिका।

हसरतें


हसरतें
शशांक एक बहुत ही सुशील लड़का था । दो बहनों में एक भाई । सब का लाडला । माता पिता की आंखों का तारा। पढ़ाई पूरी करके पिताजी के ज्वैलरी बिजनेस को ही अपना करियर बना लिया था। पापा तो पुराने जमाने के ज्वेलर्स थे पर शशांक ने पापा के बिजनेस में आधुनिकता और फैशन का ऐसा तड़का लगाया कि उसकी एक मंजिल की दुकान की जगह तीन मंजिला ज्वेलरी शॉप की बड़ी इमारत खड़ी हो गई थी ।माता-पिता अब उसकी शादी के सपने देखने लग गए थे ।लेकिन बड़ी बहन की शादी पहले करनी थी तो शशांक का नंबर बाद में आना था। इसी दरम्यान बहन की सगाई हो गई। शशांक ने भी बहन की शादी में कोई कमी नहीं छोड़ी। सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उसने 5 दिन लगातार इतने सुंदर कार्यक्रम रखे की देखने वाले हतप्रभ रह गए । बहन की बारात में उसने दिल खोलकर पैसा ऊंवारा। बहन की शादी एक सेलिब्रिटी की शादी जैसी की । बहन विदा हो गई। फूट फूट कर रोया था वह। बचपन का भाई बहन का प्यार एक दूसरे से विदा हो रहा था ।पर उस वक्त उसे सहारा दिया उसकी छोटी बहन और उसकी प्रेमिका ने।

जी हां, शशांक प्यार करता था मोना से। बेइंतहा प्यार करता था वह उसे । वह अपनी सारी परेशानियां उसके मिलने के बाद भूल जाता था। वह वक्त भी बड़ा खूबसूरत था । दिन भर काम करता और शाम को अपनी प्रेमिका के संग कुछ पल बिताता था । घरवाले सभी जानते थे मोना के बारे में । पड़ोस में जो रहती थी। बचपन से साथ खेले थे दोनों । घर पर दोनों परिवारों का आना – जाना था । मोना ने भी शशांक की बहन की शादी में शशांक का पूरा साथ दिया था । आधी से ज्यादा जिम्मेदारी तो उसी ने संभाल रखी थी ।

दो प्रेमी एक दूसरे की भाषा आंखों से ही समझ लेते थे । मोना शशांक से कितना प्यार करती थी यह सिर्फ शशांक ही जानता था । यूं कहो, शशांक की हर चाहत पर वह कुर्बान थी ।शशांक उसके बिना जीने की कभी सोच भी नहीं सकता था। इतना प्यार होने के बावजूद भी वह दोनों शादी नहीं कर सकते थे। फिर ऐसी कौन सी अड़चन थी उनकी शादी में? यही बात तो सभी की समझ से परे थी ।

शशांक मोना से ही शादी करने की जिद पर अड़ा था और उसके पिताजी यह नहीं चाहते थे। पिताजी चाहते थे कि शशांक उनकी हैसियत के हिसाब से कोई अमीर लड़की से शादी कर ले क्योंकि मोना मध्यम वर्गीय परिवार से थी और एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि मोना की कुंडली शशांक से नहीं मिलती थी और उनके पिताजी को किसी ने कह दिया था कि अगर मोना कि शशांक से शादी हो गई तो शशांक की जिंदगी को खतरा है। उसके पिताजी एक बार मोना से शादी करने के लिए मान भी जाते लेकिन उनके दिमाग में यह बात घर कर चुकी थी कि मोना से शादी करने से उनके बेटे के जीवन को खतरा है और वह अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे और कोई भी पिता अपने बेटे की जिंदगी किसी भी कीमत पर दांव पर नहीं लगाना चाहेगा। फिर लोग इसे उनका विश्वास कहे या अंधविश्वास कहे उन्हें फर्क नहीं पड़ता था। इसीलिए हर बार जब भी शशांक की शादी की बात होती तो मोना के लिए वे मना कर देते। ऐसी बातें तो उसके पिताजी सोचते थे पर शशांक ऐसा नहीं सोचता था। उसने मोना के साथ जीने मरने की कसमें खाई थी। उसने अपने पिताजी से एक दिन कह दिया था,
” पिताजी, देखो ,आज आप मुझे रुला रहे हो लेकिन एक दिन ऐसा आएगा आप मेरे लिए रोओगे ।”
सभी उसकी बात पर हंस पड़े थे। बात आई गई हो गई थी। किसी ने उस बात को ज्यादा तवज्जो भी नहीं दी थी। दिन बीत रहे थे। शशांक और मोना रोज मिलते थे। साथ घूमते थे। साथ अच्छा वक्त गुजारते थे। मोना के साथ शशांक की दिनभर की थकान मिट जाती थी। काम का प्रेशर ज्यादा था लेकिन मोना के सानिध्य में वह अपनी सारी परेशानियां भूल जाता था। वह उसका सपोर्ट थी, हर फैसले में वह मोना से विचार विमर्श करता और वह उसे सही राय देती।

मोना जानती थी कि शशांक के पिताजी उसे खास पसंद नहीं करते पर वह कभी भी शशांक पर शादी का दबाव नहीं डालती थी। उसका प्यार सच्चा था। कभी-कभी तो शशांक झूंझला जाता था पर वह समझा बूझाकर उसे शांत कर देती थी और कहती थी जो मेरी किस्मत में होगा वह हो जाएगा तुम्हें इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है ।अगर पिताजी कहते हैं तो तुम्हारी भलाई के लिए ही कुछ कहते होंगे ,तुम उनकी बात पर भी गौर करना। मोना ने कभी भी शशांक को किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं किया था ।वह दोनों तो मन की डोर से बंधे हुए थे।

शशांक और मोना की इच्छा थी कि वे दोनों उसके पिताजी की
रजामंदी से ही शादी करेंगे और इसीलिए शशांक ने कभी भी पिताजी पर शादी के लिए दबाव नहीं बनाया था । उसे पता था कि एक दिन पिताजी जरूर मान जाएंगे । मोना की अच्छाइयां उन्हें मजबूर कर देगी ।उसे अटल विश्वास था पर मोना को इस बात से फर्क नहीं पड़ता था। वह तो सिर्फ और सिर्फ शशांक से प्यार करती थी और वह उसे परेशान नहीं देख सकती थी ।उसकी दुनिया ही शशांक से शुरू होती थी और उसीपर खत्म होती थी ।दिन बीत रहे थे। शशांक अपने बिजनेस में ऊंचाइयां छू रहा था ।मोना उसका प्रबल सपोर्ट थी। घर में शशांक के सामने उसकी शादी कि चर्चा कम ही होती थी ताकि घर का माहौल खुशनुमा रहे । बहनें पिताजी को समझाने की कोशिश करती पर वे बात टाल देते। उन्हें डर था, शशांक की मोना से शादी करने से शशांक की जिंदगी को खतरा हो जाएगा। यही बात उनके जहन में घर कर चुकी थी।

मोना की अच्छाइयों ने शशांक के पिताजी का दिल जीत लिया था।
अब तो मोना भी उन्हें पसंद आने लगी थी। मोना के स्वभाव से अब वो बदल गए थे। उनकी वह एक ही चिंता उन्हें खाई जा रही थी। किसी को इस बात का इल्म नहीं था तो सभी यही सोचते थे कि पिताजी को अमिर खानदान की बहू चाहिए इसीलिए वह मोना के लिए मना कर रहे हैं। लेकिन उनके दिल की हालत वे ही समझ सकते थे। शशांक उनका इकलौता बेटा है और वे उसे बेहद प्यार करते हैं।

शशांक और उसका परिवार मामा के यहां शादी में गए हुए थे ।शशांक मोना को भी साथ लेकर गया था ।शादी में सभी को लगता था कि अब अगला नंबर शशांक और मोना का ही होगा ।सभी ने उन्हें देखकर आशीर्वाद भी दिया था।” बहुत सुंदर जोड़ी ” कहकर सभी ने नजर भी उतारी थी । मोना शर्म के मारे लाल हो रही थी। शादी संपन्न हो गई ।सारी रस्में निपट गई थी। रिसेशन में आए सभी मेहमान लगभग जा चुके थे ।अब शशांक और मोना भी खाना खाने बैठ गए थे। दोनों ने अपने दोस्तों के साथ खाना खाया, खुलकर हंसी मजाक भी किया ,खूब बातें की ,शशांक के दोस्त अब उसे छेड़ रहे थे। शशांक की शादी के विषय पर चर्चा हो रही थी । सभी मस्ती के मूड में थे। लेकिन अब काफी रात हो गई थी और सभी को जाना भी था इसलिए अपने गपशप को विराम देते हुए सभी उठ खड़े हुए। सब दोस्त विदा लेने लगे तो मोना ने भी कहा ,
“शशांक, मैं घर जा रही हूं, तुम आराम से कल के फंक्शन पूरे करके आना ।” शशांक ने उसे रोकने की कोशिश की पर वह नहीं मानी। रात में किसी के यहां रुकना उसे गंवारा नहीं लगा और शशांक से विदा लेकर वह उसके दोस्तों के साथ घर आ गई।

मोना घर तो आ गई पर अपना दिल वही छोड़ आई। रात भर करवटें बदलती रही ।शशांक के रिश्तेदारों की आवाजें उसके कानों में गूंज रही थी , “कितनी सुंदर जोड़ी है – किसी की नजर ना लगे ” वगैरह वगैरह। वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी। शशांक के साथ अपनी जिंदगी के सपने खुली आंखों से देख रही थी। वह सुखद अहसास उसकी आंखों में चमक भर रहा था । होठों पर गुलाबी मुस्कान छा गई थी ।रात भर शशांक के साथ अपनी जिंदगी का ताना-बाना बुनती रही ।मन में अनेक हसरतें मुकाम पर पहुंचने की कोशिश कर रही थी। गालों पर लालिमा छा रही थी। रात भर सोचती रही और करवटें बदलती रही। वह मुस्कुराता हुआ शशांक का चेहरा, उसकी हंसी मजाक वाला अंदाज ,उसका केयरिंग नेचर, उसकी शेरवानी में सजी हुई पर्सनालिटी ,सभी तो उसे सोने नहीं दे रही थी। उसने सारी रात आंखों में ही निकाल दी। शशांक के साथ आगे की पूरी जिंदगी की उसने प्लानिंग कर ली थी। दिल में बसी सभी हसरतों को मुकम्मल करने का वक्त आ रहा था ।मन में उमंग थी, आंखों में प्यार था और दिल में नयी जिम्मेदारी उठाने का एहसास था। इन बातों पर सोचते सोचते कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला ।बिना सोए ही वह उठ गई और नहा धोकर तैयार होकर सुबह जल्दी ही मंदिर भी जाकर आ गई। जब चाय पी रही थी तो शशांक का फोन आ गया। नंबर फ्लैश होते ही उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान छा गई।
” अकेले-अकेले चाय पी रही हो ? रुको , मैं भी आ रहा हूं । मेरे लिए चाय चढ़ा कर रखना। मैं यहां से निकल रहा हूं ।”

“अरे बाबा, आराम से आना। चाय तैयार रहेगी।” और वह शर्मा गई और शशांक ने हंसते हुए फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। वह चाय का कप हाथ में लिए उस मोबाइल की तरफ काफी देर तक देखती रही और मन ही मन मुस्कुराती रही। उसे पता ही नहीं चला कि उसकी चाय ठंडी हो चुकी है। होश तो तब आया जब मम्मी ने उसे टोका। उसने कप की तरफ देखा तो पता चला चाय पानी हो चुकी है। उसने कप मेज पर रख दिया और वही बैठे-बैठे शशांक का इंतजार करने लगी और चाय अब साथ में ही पियेंगे यही सोच कर अखबार उठा लिया और समाचार देखने लग गई ।पर मन तो अखबार में था ही नहीं बार-बार नजर घड़ी की तरफ उठ रही थी। दो-तीन बार मोबाइल हाथ में लिया और सोचा कॉल लगाकर पूछ लूं पर फिर सोचा शशांक ड्राइव कर रहा होगा, उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं होगा और मोबाइल वापस मेज पर रख दिया।

शशांक ने तो कुछ ही देर में आने को कहा था पर अब तो डेढ़ घंटा बीत गया। उसका दिल बेचैन हो रहा था। उसका फोन भी नहीं आया था। दो बार चाय का पानी गर्म कर चुकी थी ।अब सब्र का बांध टूट रहा था और उसने उसे फोन करने के लिए मोबाइल उठाया ही था कि कोई अनजान नंबर से फोन बज उठा। उसने तुरंत ही फोन उठा लिया और “हेलो ” कहा ।
जैसे ही उसने फोन उठाया उसे फोन पर शोर सुनाई दिया और तभी उधर से आवाज आई,
” यह जिनका फोन है उनका भयंकर एक्सीडेंट हो गया है और उनकी—— शायद मौत हो चुकी है ।”
फोन हाथ से गिर गया। वह लडखडा कर गिरने ही वाली थी कि पीछे से मम्मी ने उसे थाम लिया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। आंखें शुष्क हो चुकी थी। उसकी यह बदहवास हालत देखकर मम्मी घबरा गई , उसने उसे झंझोड़ा।
” क्या हुआ बेटा ? किसका फोन था ?”
तब कहीं जाकर उसे होश आया। उसने झट से मोबाइल उठाया और उस नंबर पर वापस डायल किया तो पुलिस ने फोन उठाया।
उसने अपने आप को संयत किया और पूछा,
” आप कहां से बोल रहे हो ?”
पुलिस वाले ने पता बता दिया।
उसने कहा,” आप उन्हें अस्पताल पहुंचा दो प्लीज ।”
“मैडम, उनके साथ दो लड़कियां और है ,वे भी गंभीर हालत में है। हम पहले उन्हें अस्पताल लेकर जा रहे हैं ।इनकी तो शायद मृत्यु हो चुकी है । आप कौन लगते हो इनके ? आप जल्दी पहुंचे।”
” सुनिए तो ——” वह कुछ कहना चाह रही थी उससे पहले ही फोन कट गया। वह शशांक के घर की तरफ दौड़ पड़ी। पीछे-पीछे उसकी मम्मी भी भागी। मोना गेट से ही चिल्ला रही थी ,”अंकल –अंकल”। उसकी घबराई हुई आवाज सुनकर शशांक के पापा दौड़ते हुए ही बाहर आए ।वह सीधी उनसे जाकर लिपट गई ।वह हड़बड़ा गए ।
” क्या हुआ बेटा ? क्या बात है? ” वह बोल ही रहे थे कि उनकी नजर मोना की मां पर पड़ी जो दौड़ते हुए आ रही थी और जोर-जोर से हांफ रही थी ।उन्होंने मोना को अपने से दूर किया और पूछा,
” क्या हुआ बेटा? तुम दोनों ऐसे दौड़ के क्यों आई हो? “
उसने अंकल को अंदर ले जाकर सोफे पर बिठाया और फिर उनका हाथ पकड़ कर कहा,
” पापा, श–श–शशांक—— नहीं रहा । उसका एक्सीडेंट—— हो गया ।”
शब्द मुश्किल से निकल रहे थे और उसके मुंह से अनायास ही पापा निकल गया था ।
झटके से अपना हाथ छुड़ाते हुए उन्होंने मोना को अपने आप से दूर किया। वह कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। तभी मोना झ‌ट से वहां से उठी और डाइनिंग रूम से कार की चाबी लेकर कार की तरफ दौड़ पड़ी।
कार स्टार्ट करके गेट से बाहर आ गई तब तक मोना की मम्मी शशांक के पापा को पकड़कर बाहर ले आई और कार की आगे की सीट पर बिठा दिया । शशांक के पापा अभी भी सदमे में थे ।उन्हें होश तो तब आया जब कार हाईवे पर पहुंच गई थी । फिर तो उन्होंने झटपट अपने कुछ खास रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन करके उन्हें एक्सीडेंट की जगह पर आने के लिए कहा। मोना कार फर्राटे से दौड़ा रही थी। जब वे वहां पहुंचे तो काफी भीड़ थी। भीड़ को चीरते हुए वे दोनों वहां तक पहुंचे जहां शशांक लेटा हुआ था। उन्होंने शशांक को देखा जो एक सफेद कपड़े में ढका हुआ था ।मोना वही ठिठक गई । उसके पापा ने कपड़ा उठाकर उसका चेहरा देखा तो वे अपने आप को रोक नहीं पाए और वही बेसुध होकर गिर पड़े । लोगों ने उन्हें सहारा दिया तभी उनके रिश्तेदार और कुछ दोस्त वहां पहुंच गए ।जब उन्हें पता चला कि दो लड़कियों को अभी हॉस्पिटल लेकर गए हैं तो सभी हॉस्पिटल की तरफ निकल पड़े। मोना वही शशांक के पास रुक गई ।उसने एक बार फिर से उसके चेहरे से कपड़ा हटाया और जी भर कर उसे देखना चाहती थी । तभी पुलिस ने कहा इन्हें पोस्टमार्टम के लिए ले जाना पड़ेगा ।वह उसकी बॉडी को एंबुलेंस में शिफ्ट करना चाह रहे थे और मोना पथरीली आंखों से उसे निहार रही थी। ना वह रोई और ना ही कुछ बोली ।वह सिर्फ वे लोग क्या कर रहे हैं यह देख रही थी और जैसे ही बॉडी को एंबुलेंस में शिफ्ट किया वह भी एंबुलेंस में जाकर बैठ गई ।पुलिस ने भी उसे टोका नहीं ।उधर शशांक की दोनों बहने गंभीर घायल थी। प्रायमरी ट्रीटमेंट के बाद एक को वहीं भर्ती कर लिया गया पर एक ही हालत काफी नाजुक थी इसलिए उसे मुंबई एयरलिफ्ट करने की कोशिश की जा रही थी ।

एक पल में सब कुछ खत्म हो गया था। शशांक की बॉडी पोस्टमार्टम के बाद घर आ गई। सबका रो-रो कर बुरा हाल था पर मोना की आंखों में एक भी आंसू नहीं था। घर का इकलौता चिराग बुझ चुका था ।अंतिम विदाई की तैयारी चल रही थी। मोना शशांक के पास ही बैठी थी। वह चुपचाप उसे निहार रही थी। उसकी पलके बस उसी के चेहरे पर टिकी हुई थी। पंडित जी ने अंतिम विधियां पूरी करने के बाद कहा इसके मुंह में कुछ स्वर्ण रख दीजिए। मोना ने बिना कुछ सोचे समझे अपने हाथ में शशांक की दी हुई उसकी आखिरी निशानी सोने की अंगूठी अपनी उंगली से उतारी और उसके मुंह में रख दी। कोई और कुछ स्वर्ण आभूषण लेकर आता उससे पहले ही शशांक की अर्थी गमगीन माहौल में उठ गई । शशांक का अंतिम संस्कार हो गया सब घर वापस आ गए। मोना ने भी स्नान करके उसके घर की जिम्मेदारी संभाल ली। वह चुपचाप सभी का काम करती। शशांक के मम्मी और पापा का ख्याल रखती ।पर वह ना कुछ बोलती ना ही रोती। मोना की मम्मी को चिंता होने लगी कहीं सदमे से उसे कुछ हो ना जाए? शशांक के पापा भी परेशान थे। उसे समझाने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ ।घर वालों ने उसे ताने मारे, भला बुरा कहा ,बिन ब्याही बहू भी कहा, पर कुछ असर ना हुआ। शायद उसकी आत्मा शशांक के साथ ही चली गई थी। उसकी पाषाण आंखों में कोई उमंग , कोई हसरतें नहीं रही।

शशांक की एक बहन को मुंबई एयरलिफ्ट किया गया तब शशांक की मम्मी बेटी के साथ वहां चली गई और पिताजी दूसरी बेटी के साथ रुक गए । मोना दिन रात उनकी सेवा करती। घर संभालती और रात को 11-12 बजे अपने घर जाती और सुबह 5:00 बजे ना धोकर वापस शशांक के घर आ जाती। शशांक की मम्मी को फोन पर उसकी बहन के हाल-चाल पूछती और वक्त मिलता तब मंदिर में बैठकर उसके लिए प्रार्थना करती ।

मोना की हालत किसी से देखी नहीं जा रही थी।उसके मम्मी पापा बेटी की हालात देखकर रोते थे ।उसका भाई उसे कैसे भी रुलाने की कोशिश करता था पर कोई सफलता नहीं मिलती। दसवे दिन खबर आई कि शशांक की बहन का स्वर्गवास हो गया और उसका अंतिम संस्कार वही मुंबई में ही किया जाएगा। बस, इस खबर ने उसे तोड़ दिया और 10 दिन से सुप्त पड़े आंसू बह निकले। वह रोई और रोती ही गई। किसी ने उसे चुप कराने की कोशिश भी नहीं की। वह अब समझ पाई कि उसका सब कुछ खत्म हो गया है । उसे एहसास हो चला कि उसकी दुनिया उजड़ चुकी है। उसके सारे सपने बिखर चुके हैं। उसकी सारी हसरतों को तिलांजलि अर्पित हो चुकी है। वह खामोश हो गई।

दिन बीत रहे थे ।शशांक की बड़ी बहन घर आ गई थी ।वह ठीक हो रही थी। मोना उसकी अच्छे से देखभाल कर रही थी ।दो बच्चों को, दो जिगर के टुकड़ों को खोने के बाद शशांक के मम्मी पापा की हालत खराब थी। वह उनके बच्चों की जगह तो नहीं ले सकती थी लेकिन कोशिश कर रही थी कि उनका सहारा बन जाए और उनका दुख कुछ कम हो जाए। उसका रोज का वही सिलसिला था, सुबह से शाम तक सबकी सेवा करती, घर संभालती ।शशांक के मम्मी पापा को संभालती। वह अपने आप को तो भूल ही चुकी थी। उसका दर्द सभी समझते थे पर उपाय किसी के पास नहीं था।

शशांक के पापा से अब इस बच्ची का दर्द देखा नहीं जा रहा था। कुछ तो उपाय करना ही पड़ेगा ,इसके बारे में वे सोचते रहते थे । एक अच्छा सा लड़का देखकर उसके मम्मी पापा से बात करके उसका रिश्ता जल्द से जल्द तय कर दिया जाए और एक अच्छा सा मुहूर्त निकाल कर उसकी शादी कर दी जाये। वह इस तरह की प्लानिंग करने लगे। वह इस माहौल से निकलकर किसी नई जगह पर अपनी नई दुनिया बसाए जहां शशांक की यादों से वह अपना पीछा छुड़ा सके और अपनी जिंदगी को एक नया मोड़ दे ,यही उनका मकसद था।
पर मोना इस बात पर राजी नहीं होगी यह सभी को पता था। उसे कैसे मनाया जाए ? कैसे मनाया जाए यह बड़ा प्रश्न था सभी के सामने।आखिर में शशांक के पापा ने ही यह जिम्मेदारी उठाने की सोची ।एक दिन मोना को अपने पास बिठाकर उन्होंने उसे कहा,
” मोना बेटा , तेरी कुंडली देखकर मैंने शशांक को इस रिश्ते से मना किया था। पर मुझे नहीं पता था कि शशांक की कुंडली तुम्हारे लिए ठीक नहीं थी। मेरे बेटे की वजह से आज तुम्हारी यह हालत है। तुम्हारी इस हालात का जिम्मेदार मेरा बेटा है। मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगा ।” उनका गला रूंध आया और आंखें भर आई।

उनकी बातें मोना के दिल को चुभ गई। वह कुछ देर चुप रही और फिर बोली ,
” पापा , शशांक को कुछ मत कहिए। उसका कोई दोष नहीं। मेरा नसीब ही ऐसा है। आप शशांक को मत कोसिए। शशांक बहुत अच्छा है।”
” है नहीं —- था —था कहो बेटा । ‘था ‘। वह जा चुका है इस दुनिया से। वह मर चुका है ।वह हमें छोड़कर जा चुका है ।”
शशांक के पापा ने बड़े ही कठोरता से कहा ।
” पापा, ऐसा मत कहीए ।वह जिंदा है ,आपके दिल में ,मेरे दिल में, सभी के दिल में वह है ।” मोना रोते हुए कह रही थी ।
” झूठ! वह अब हमारे किसी के दिल में नहीं है। उसको हम सभी भुला चुके हैं और और तुम भी बुला दो। मैंने तुम्हारे लिए एक अच्छा लड़का देखा है,वह तुम्हें हमेशा खुश रखेगा। मैं तुम्हें अपनी बहू तो नहीं बना सकता पर एक बेटी की तरह इस घर से विदा करूंगा।”
वे भावुक हो रहे थे।
“नहीं पापा — यह नहीं हो सकता।”
“आपकी हर बात मेरे सर आंखों पर । पर —-पर यह नहीं हो सकता।” उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बड़े ही दृढ़ता से कहा।
” यह मेरा आखिरी फैसला है , शशांक मर चुका है और अब उसका तुम्हारे साथ कोई रिश्ता नहीं है और ना ही हमारे साथ उसका कोई रिश्ता है। जो चला गया उसकी यादों में हम हमारा अगला जीवन बर्बाद नहीं कर सकते और तू भी मत कर। जा, जिले अपनी जिंदगी। और आज के बाद दोबारा इस घर में कदम मत रखना।”
उन्होंने बड़े ही दृढ़ता से कहा और उससे दूर हो गए।
उनकी आंखें नम हो गई और लाख कोशिश करने के बावजूद भी दो बूंदें उनके गालों पर सरक आई। उनके कानों में शशांक के शब्द गूंज रहे थे , “देखो पापा, एक दिन मैं आपको रुलाऊंगा।”

मोना रोती रही। लेकिन कोई उसके आंसू पोंछने नहीं आया ।अब कोई भी उसे कमजोर नहीं करना चाहता था ।उसने अपनी नज़रें सब पर दौडाई पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। वह हताश होकर वहां से चली गई ।वह रोज सुबह आती पर उसके लिए दरवाजा नहीं खुलता । कुछ दिन यह सिलसिला चलता रहा ।फिर धीरे-धीरे उसका आना बंद हो गया । बड़ा कठिन फैसला था शशांक के घर वालों के लिए इस तरह का व्यवहार करना, पर ऐसा करना जरूरी था। उसकी संपूर्ण जिंदगी का सवाल था ।अगर आज वह इतना कठोर नहीं बनेंगे तो उसकी आने वाली जिंदगी तबाह हो जाएगी और वह ऐसा कभी नहीं चाहते थे।

धीरे-धीरे मोना के मम्मी पापा ने उसे शादी के लिए मना लिया। बुझे मन से , टूटे हुए दिल से उसने ‘हां ‘ कह दी ।शशांक के पापा ने बड़े ही धूमधाम से उसकी शादी रचाई। जब यज्ञ की वेदी पर मंत्रोच्चार हो रहे थे तब उसकी नज़रें शशांक के पिताजी पर पड़ी, उनकी आंखों से निरंतर अश्रु बह रहे थे। उनके उन अश्रुओं में और अग्नि की पवित्र ज्वाला में अपनी हसरतों को तिलांजलि देकर मोना ने सप्तपदी के लिए अपने कदम आगे बढ़ा दिए।

डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएलएम
लेखिका ,समाजसेविका और ब्लॉगर।





चुड़ा प्रथा –एक सामाजिक कुप्रथा या सामाजिक सुरक्षा

चुड़ा प्रथा —
एक सामाजिक कुप्रथा या सामाजिक सुरक्षा

सुमन की शादी धूमधाम से हुई ।लड़का पढ़ा लिखा था ,फौज में नौकरी थी। सुमन भी दसवीं तक पढ़ी थी, पर गरीब परिवार से होने से और अच्छा लड़का मिलने की वजह से अठारह साल की होते होते उसकी शादी हो गई ।लड़का फौज में होने की वजह से बार-बार छुट्टियां नहीं मिलती थी तो चट मंगनी पट ब्याह वाला रिश्ता हो गया।
सुमन को वह पहले से ही जानता था, एक गांव में जो रहते थे और कई बार जलसे में मिल भी चुके थे। सुमन भी उसे पसंद करती थी।

शादी के बाद दोनों की जिंदगी अच्छी गुजर रही थी। वह साल में कुछ दिन की छुट्टियां लेकर आ जाता था ।वह जो वक्त था वह बहुत अच्छा बीतता था दोनों का । दोनों साथ घूमते ,सिनेमा देखते ,होटल में खाना खाते, और मौज मस्ती करते ।घरवाले भी उन्हें कुछ नहीं कहते, फौजी आदमी था ।पूरे गांव में उसकी इज्जत थी। फौजी की बीवी होने से सुमन की भी इज्जत थी गांव में ।
दोनों के प्रेम का फल एक बेटे के रूप में जल्दी ही मिल गया ।अब गृहस्थी और भी खुशहाल हो गई थी लेकिन शायद ऊपर वाले को उनकी खुशियां मंजूर नहीं थी। एक दिन एक फोन आया और सुमन की दुनिया उजड़ गई।
” आपका पति देश के लिए शहीद हो गया।”
सुमन की जिंदगी तबाह हो गई ।आतंकियों के हाथों उसका सुहाग उजड़ गया ।सुमन विधवा हो गई ।सरकार का, समाज का और रिश्तेदारों का दायित्व बनता है कि अब सुमन और उसके बच्चे की जिंदगी संवारें।
सरकार अपनी नीतियों के अनुसार अपना दायित्व पेंशन देकर या मुआवजा देकर या फिर परिवार में से किसी को नौकरी देकर पूरा करती है।
जहां तक नौकरी की बात आती है तो सुमन तो दसवीं पास थी और हमारे यहां पर छोटी सी नौकरी के लिए भी ग्रेजुएट होना जरूरी होता है ,नहीं तो अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती फिर भले ही हमारे नेता या कानून बनाने वाले अंगूठा छाप क्यों ना हो पर नौकरी के लिए डिग्री जरूरी है। और अगर मुआवजा राशि ज्यादा होती है तो पैसों के लालच में घरवाले उस औरत पर उसके पति के छोटे भाई या बड़े भाई
यानी देवर या जेठ से रिश्ता बनाने के लिए दबाव डालते हैं और उसी को सरकारी नौकरी मिले इसका प्रबंध करने की कोशिश करते हैं, सरकारी नौकरी का लालच सभी को रहता है।
अब सवाल उठता है कि क्या यह उचित है ? क्या उसे यह रिश्ता, यह दबाव मंजूर है? ऐसे रिश्तो से उसे सामाजिक सुरक्षा मिलती है?
इस सोच के आगे वह विधवा अपनी हसरतों का, अपनी इच्छाओं का गला तो नहीं घोट रही है? सामाजिक सुरक्षा के बदले अपनी जिंदगी का सौदा उसे मंजूर है? कभी-कभी ऐसे में अनुचित वर के साथ रिश्ता जोड़ा जाता है जैसे कोई शराबी, जुआरी, कम पढ़ा लिखा या फिर शादीशुदा। कभी-कभी तो यह रिश्ता उम्र में काफी बड़े व्यक्ति से या उम्र में काफी छोटे व्यक्ति से हो जाता है। कभी-कभी तो उन दोनों में कोई तालमेल भी नहीं होता ऐसी स्थिति में उस औरत पर क्या गुजरती होगी।
लालच बुरी बला है पर इस लालच के सामने सब कुछ जायज है। ऐसी विधवाओं को परिवार के ही किसी सदस्य देवर या जेठ से बांधा जाता है जिसे चूड़ा प्रथा कहते हैं।

चूड़ा प्रथा सदियों पुरानी सामाजिक प्रथा है। इन विधवाओं का बिना दोष के अपराधबोध और निराश चेहरा बताता है कि उन्होंने क्या खोया है, जहां एक महिला जिसने अपने पति को खो दिया है, वह अपने देवर या जेठ के नाम पर शादी की चूड़ियां पहनती है. वह अब केवल उसकी एक रिश्तेदार नहीं है, बल्कि पत्नी है. स्थानीय रूप से, सामाजिक लेन-देन को ‘निपटान’ के रूप में जाना जाता है. देवर या जेठ घर और गांव में ‘नारी की गरिमा’ को पुनर्स्थापित करेगा. लेकिन किसी भी लेन-देन की तरह, उसकी स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि वह मेज पर क्या ला सकती है, और युद्ध के दौरान पति खोने वाली महिलाओं और विधवाओं के मामले में, यह नकद, मुआवजा और नौकरी है।
कई बार पति की मृत्यु किसी एक्सीडेंट में ,पुल टूटने से ,आतंकवादी हमले में या कोई और वजह से हो जाती है जहां पर परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाती है ऐसे में यह प्रथा और भी बढ़ जाती है। पति के पश्चात कई बार नौकरी के लालच में कई ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जो औरत के लिए सही नहीं होते हैं या फिर उसकी मर्जी पूछी ही नहीं जाती है ।कई बार वह भी नौकरी के लिए तैयार नहीं होती या फिर उसे नौकरी करवाई नहीं जाती या फिर उसकी काबिलियत नौकरी के लिए नहीं होती है ,ऐसे में अच्छी नौकरी के लिए परिवार के किसी और सदस्य को चयनित किया जाता है। ऐसे में उस विधवा को अपने परिवार में रखने के लिए यह चूड़ा प्रथा अपनायी जाती है। कई बार तो उसे जेल की चारदीवारी की तरह घर में बंद किया जाता है और उसे अपनी मर्जी की जिंदगी जीने की इजाजत नहीं होती।

ग्रामीण राजस्थान में और कुछ कस्बों में यह बड़े पैमाने पर प्रचलित प्रथा के स्पष्ट निहितार्थ हैं: एक महिला या तो अपने देवर या जेठ से बंधी होती है, सिर्फ नाम के लिए नहीं. सामाजिक रीति-रिवाज यह तय करते हैं कि उनका वैवाहिक संबंध है। कई बार तो उसके देवर या जेठ शादीशुदा होते हैं ऐसे में स्थिति और भी जटिल हो जाती है
पैसे या नौकरी के लालच में जो उसकी कानूनी बीवी है उसे या तो छोड़ दिया जाता है या फिर पास रख कर दोनों के साथ रहना भी एक मजबूरी बन जाती है और प्रथा के अनुसार उसे अपनी कानूनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाए रखने होंगे। ऐसे में उस व्यक्ति की कानूनी पत्नी की मनःस्थिति या फिर उस विधवा कि मनःस्थिति कि क्या कोई कल्पना कर सकता है? ऐसे में कभी-कभी तो यह महिलाएं मानसिक तनाव का शिकार बन जाती है और आत्महत्या भी कर लेती है।
कई मामलों में तो परिवारों में बच्चों के तीन सेट होते हैं. पहला विधवा और उसके दिवंगत पति से, दूसरा देवर/ जेठ और उसकी पत्नी से और तीसरा विधवा और देवर/ जेठ के रिश्ते से पैदा हुआ । ऐसे में आगे चलकर संपत्ति में लड़ाई झगड़े बढ़ जाते हैं या फिर कानूनी पेचीदगियां बढ़ जाती है।
किसी भी दुर्घटना में जान गवाने वाले पति से विधवा हुई औरत जिसे मुआवजा और नौकरी उसे सम्मान के साथ जिंदगी बिताने के लिए दी जाती है, उसी से इस प्रथा पर लालच का बुरा साया पड़ता है और इसे बढ़ावा मिलता है। अब हमें गहनता से इस पर विचार करना है कि यह एक कुप्रथा है या सामाजिक सुरक्षा है।
अब हमें तय करना है कि इस प्रथा को हम कैसे समाप्त कर सकें और सरकार इस प्रथा का कैसे अंत करें ताकि एक विधवा अपनी मर्जी से सम्मानजनक जिंदगी जिए। कई समाज सेवी संस्था और कई समाज सुधारक इसपर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि जल्द ही सती प्रथा की तरह यह चूड़ा प्रथा भी खत्म हो जाएगी और इन विधवाओं की इच्छाओं की कद्र होगी और वे अपने आत्मसम्मान और सामाजिक सुरक्षा के साथ अपनी जिंदगी जी सकेगी।
धन्यवाद ।
डॉ मंजू राठी।
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएल एम।
लेखिका ,ब्लॉगर ,समाज सेविका।